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चंडीगढ़ (हरियाणा)। आप यदि शहर में मकान बनाने जा रहे हैं तो आपके लिए राहत की खबर है। आवेदकों को अब नगर पालिकाओं के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे। बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सिस्टम के जरिये नक्शा प्लान का आवेदन करने के कुछ घंटों के भीतर मंजूरी दे दी जाएगी। हरियाणा बिल्डिंग कोड के अनुरूप नक्शे को अप्रूवल मिल जायेगा तो इसके बाद ईमेल के जरिए इसकी सूचना आवेदक को मिल जाएगी। सिस्टम खुद ही पहले से फीड दिशानिर्देश के अनुसार नक्शे का शुल्क भी निर्धारित कर देगा।
शहरी स्थानीय निकाय मंत्री कविता जैन का कहना है कि यमुनानगर, टोहाना, पानीपत में विभाग से जुड़े आर्किटेक्चर ने आवेदनों पर काम शुरू कर दिया है। इसके अलावा बड़े स्ट्रेक्चर डिजाइनर को भी विभाग अपने साथ जोड़ेगा ताकि आम लोगों को परेशानी न उठानी पड़े। मंत्री कविता जैन ने कहा कि पारदर्शी व्यवस्था से लोगों को घर बैठे नक्शे हासिल करने की सुविधा मिलेगी। कुछ लोग भ्रम फैलाकर ऑनलाइन सिस्टम के प्रति दुष्प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि नई व्यवस्था से दलाल तंत्र खत्म हो जाएगा और अधिकारी व कर्मचारी भी किसी आवेदक को परेशान नहीं कर पाएंगे। अब देखना यह होगा कि इस नई व्यवस्था से लोगों को लेटलतीफी और दलाली से मुक्ति मिलती है या नहीं मिलती है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ ने मध्य प्रदेश के पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक छुट्टी की सौगात दी है. इस साप्ताहिक छुट्टी की शुरुआत गुरुवार से हुई. इसके तहत भोपाल के करीब 351 पुलिसकर्मियों को पहली बार साप्ताहिक छुट्टी मिली. पुलिस मुख्यालय के आदेश के मुताबिक , गुरुवार को जिला पुलिस भोपाल के इंस्पेक्टर,सब इंस्पेक्टर, असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर, हेड कॉन्स्टेबल, कॉन्स्टेबल समेत कुल 351 अधिकारी/कर्मचारी ने साप्ताहिक छुट्टी पर थे. पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों ने मुख्यमंत्री के इस कदम पर बहुत खुशी जतायी है. उनका कहना है कि उनका बाहर घूमना या रिश्तेदारी में जाना लगभग बन्द हो गया था, लेकिन साप्तहिक छुट्टी मिलना शुरू हुआ है तो अब वो अपने रिश्तेदारों के यहां उन्हें वक़्त मिलने पर ले जा सकते हैं.
आपको बता दें कि कांग्रेस पार्टी ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अपने वचनपत्र में प्रदेश के पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक छुट्टी देने का वादा किया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार 19 दिसंबर को पुलिस मुख्यालय पहुंचे कमलनाथ ने साप्ताहिक अवकाश देने की तैयारी करने के निर्देश दिए थे। वहीं पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिए थे कि एक जनवरी से पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश दिया जाए। प्रदेश में 56 हजार पुलिसकर्मी हैं। 8 हजार पुलिस कर्मी रोजाना अवकाश पर रहेंगे। अवकाश पर रहने के दौरान 08 हजार पुलिसकर्मियों के स्थान पर दूसरी यूनिट से पुलिस कर्मियों की ड्यूटी पर लगाया जाएगा। यदि किन्हीं कारणों से पुलिस का जवान निर्धारित दिन में साप्ताहिक छुट्टी नहीं ले पाता है , तो ऐसी स्थिति में पुलिस कर्मी को उसी महीने में साप्ताहिक अवकाश लेना होगा। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में 1 लाख 25 हजार 585 पुलिस कर्मी हैं।
मुख्यमंत्री बनने के बाद कमलनाथ ने मध्य प्रदेश के पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक छुट्टी की सौगात दी है. इस साप्ताहिक छुट्टी की शुरुआत गुरुवार से हुई. इसके तहत भोपाल के करीब 351 पुलिसकर्मियों को पहली बार साप्ताहिक छुट्टी मिली. पुलिस मुख्यालय के आदेश के मुताबिक , गुरुवार को जिला पुलिस भोपाल के इंस्पेक्टर,सब इंस्पेक्टर, असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर, हेड कॉन्स्टेबल, कॉन्स्टेबल समेत कुल 351 अधिकारी/कर्मचारी ने साप्ताहिक छुट्टी पर थे. पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों ने मुख्यमंत्री के इस कदम पर बहुत खुशी जतायी है. उनका कहना है कि उनका बाहर घूमना या रिश्तेदारी में जाना लगभग बन्द हो गया था, लेकिन साप्तहिक छुट्टी मिलना शुरू हुआ है तो अब वो अपने रिश्तेदारों के यहां उन्हें वक़्त मिलने पर ले जा सकते हैं.
आपको बता दें कि कांग्रेस पार्टी ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अपने वचनपत्र में प्रदेश के पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक छुट्टी देने का वादा किया था. मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार 19 दिसंबर को पुलिस मुख्यालय पहुंचे कमलनाथ ने साप्ताहिक अवकाश देने की तैयारी करने के निर्देश दिए थे। वहीं पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिए थे कि एक जनवरी से पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश दिया जाए। प्रदेश में 56 हजार पुलिसकर्मी हैं। 8 हजार पुलिस कर्मी रोजाना अवकाश पर रहेंगे। अवकाश पर रहने के दौरान 08 हजार पुलिसकर्मियों के स्थान पर दूसरी यूनिट से पुलिस कर्मियों की ड्यूटी पर लगाया जाएगा। यदि किन्हीं कारणों से पुलिस का जवान निर्धारित दिन में साप्ताहिक छुट्टी नहीं ले पाता है , तो ऐसी स्थिति में पुलिस कर्मी को उसी महीने में साप्ताहिक अवकाश लेना होगा। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में 1 लाख 25 हजार 585 पुलिस कर्मी हैं।
नई दिल्ली। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने अगली सुनवाई 10 जनवरी तक के लिए टाल दी है। अब 10 जनवरी को मामला सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की स्पेशल बेंच के सामने जाएगा। इस बेंच में शामिल जजों के नाम का ऐलान 6 या 7 जनवरी को कर दिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कहना था कि इस मामले की सुनवाई के लिए एक रेग्युलर बेंच बनेगी, जो 10 जनवरी को इस मामले में आगे के आदेश परित करेगी। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने वकील हरिनाथ राम की तरफ से दाखिल की गई उस जनहित को भी खारिज कर दिया , जिसमें अयोध्या विवाद की रोजाना सुनवाई की मांग की गई थी। हैरानी की बात यह है कि जब मुख्य न्यायाधीश के सामने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामला आया तो उन्होंने महज 60 सेकेंड ही में मामले की सुनवाई 10 जनवरी तक के लिए टाल दी। 10 जनवरी से पहले इस मामले के लिए नई बेंच का गठन किया जाएगा. अब नई बेंच ही ये तय करेगी कि क्या ये मामला फास्टट्रैक में सुना जाना चाहिए या नहीं.जबकि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल की बेंच से इस मामले में जल्द सुनवाई की मांग की गयी थी। जबकि इस मामले में पहले पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच सुनवाई कर रही थी। ऐसे में दो सदस्यीय बेंच विस्तृत सुनवाई नहीं कर सकती। इस पर तीन या उससे अधिक जजों की बेंच ही सुनवाई करेगी। नई बेंच इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई करेगी।
वहीं हिंदू महासभा के वकील का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट 10 जनवरी को इस मामले को सुनेगा, तब तक नई बेंच का गठन कर लिया जाएगा. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट जब 10 जनवरी को इस मामले को सुनेगा तो हम अपील करेंगे कि वह इस मामले की रोजाना सुनवाई करे. अगर सुप्रीम कोर्ट इस मामले को दोबारा सुनता है तो अगले 60 दिनों में इसका फैसला आ सकता है. हिंदू महासभा के वकील का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खुश हैं. जबकि बाबरी केस के पक्षकार इकबाल अंसारी का कहना था कि राम मंदिर पर केंद्र सरकार को अध्यादेश नहीं लाना चाहिए. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल सही कहा है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और हमें फैसले का इंतजार करना चाहिए.
आपको बता दें कि 30 सितंंबर, 2010 को इलाबाद उच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय बेंच ने 2.1 के बहुत वाले फैसले में कहा था कि 02.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर-बराबर बांट दिया जाए। हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को किसी भी पक्ष ने नहीं स्वीकार किया और उसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी । वहीं इस मामले की सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 09 मई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी। उस समय से अब तक आठ साल हो गए हैं, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) । दूर संचार विभाग के पेंशनधारकों के लिए राहत की खबर है, अब उन्हें बैंक, पोस्ट ऑफिस और लखनऊ का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। नियंत्रक संचार लेखा विभाग लखनऊ की उपशाखा वाराणसी में पेंशनधारकों की समस्याओं को देखते हुए विभाग ने मैनुअल कामकाज की बजाए ऑनलाइन का सहारा लिया है। अब इसके लिए ‘संपन्न’ सॉफ्टवेयर भी तैयार कर लिया है, जिसका 29 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुभारंभ करेंगे।
आपको बता दें कि भारत दूर संचार विभाग के पेंशनधारकों को एक अक्तूबर 2000 के पहले उनकी पेंशन राशि को बैंक और पोस्ट ऑफिस के माध्यम से उनके खाते में भेजी जाती थी। इसकी वजह से दूर संचार विभाग प्रति वर्ष चार्ज के रूप में संबंधित बैंकों और पोस्ट आफिसों को मिलाकर 35 करोड़ रुपये देता था। इसमें अकेले लखनऊ कार्यालय से दो करोड़ रुपये जाते थे। इसको संज्ञान में लेते हुए विभाग ने ‘संपन्न’ सॉफ्टवेयर तैयार किया है। इसे तैयार करने में 2.77 करोड़ रुपये खर्च आया है। इस सॉफ्टवेयर की मदद से अब संबंधित डीओटी के पेंशनधारकों के खाते में ऑनलाइन पेंशन भेज दी जाएगी। यह सुविधा पूर्वांचल के वाराणसी, जौनपुर, मिर्जापुर, भदोही, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, गोरखपुर, देवरिया, प्रतापगढ़, सोनभद्र समेत 18 जनपदों के पेंशनधारकों को दी जाएगी। नियंत्रक संचार लेखा विभाग की उपशाखा एक दिसंबर से वाराणसी में खोली गई है। इसके अलावा इन पेंशनधारकों को निर्धारित सॉफ्टवेयर पर ऑनलाइन जीवित प्रमाण पत्र देने की भी सुविधा प्रदान कर दी गई है।
वाराणसी (उत्तर प्रदेश) । दूर संचार विभाग के पेंशनधारकों के लिए राहत की खबर है, अब उन्हें बैंक, पोस्ट ऑफिस और लखनऊ का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। नियंत्रक संचार लेखा विभाग लखनऊ की उपशाखा वाराणसी में पेंशनधारकों की समस्याओं को देखते हुए विभाग ने मैनुअल कामकाज की बजाए ऑनलाइन का सहारा लिया है। अब इसके लिए ‘संपन्न’ सॉफ्टवेयर भी तैयार कर लिया है, जिसका 29 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुभारंभ करेंगे।
आपको बता दें कि भारत दूर संचार विभाग के पेंशनधारकों को एक अक्तूबर 2000 के पहले उनकी पेंशन राशि को बैंक और पोस्ट ऑफिस के माध्यम से उनके खाते में भेजी जाती थी। इसकी वजह से दूर संचार विभाग प्रति वर्ष चार्ज के रूप में संबंधित बैंकों और पोस्ट आफिसों को मिलाकर 35 करोड़ रुपये देता था। इसमें अकेले लखनऊ कार्यालय से दो करोड़ रुपये जाते थे। इसको संज्ञान में लेते हुए विभाग ने ‘संपन्न’ सॉफ्टवेयर तैयार किया है। इसे तैयार करने में 2.77 करोड़ रुपये खर्च आया है। इस सॉफ्टवेयर की मदद से अब संबंधित डीओटी के पेंशनधारकों के खाते में ऑनलाइन पेंशन भेज दी जाएगी। यह सुविधा पूर्वांचल के वाराणसी, जौनपुर, मिर्जापुर, भदोही, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, गोरखपुर, देवरिया, प्रतापगढ़, सोनभद्र समेत 18 जनपदों के पेंशनधारकों को दी जाएगी। नियंत्रक संचार लेखा विभाग की उपशाखा एक दिसंबर से वाराणसी में खोली गई है। इसके अलावा इन पेंशनधारकों को निर्धारित सॉफ्टवेयर पर ऑनलाइन जीवित प्रमाण पत्र देने की भी सुविधा प्रदान कर दी गई है।
नई दिल्ली। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने दिल्ली के निजी स्कूलों को प्रवेश से पूर्व आधार की मांग न करने की हिदायत दी है। यूआईडीएआई कहा है कि बच्चों के दाखिले से पहले 12 अंकों वाली बायोमीट्रिक संख्या की मांग करना उच्चतम न्यायालय के हालिया आदेश के खिलाफ है। इस समय दिल्ली के 1,500 से अधिक निजी स्कूलों में नर्सरी और प्रवेश स्तर की अन्य कक्षाओं के लिए दाखिले की प्रक्रिया चल रही है।
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने कहा है कि उसे ऐसी खबरें मिली हैं कि कुछ निजी स्कूल नर्सरी में प्रवेश के लिये आवश्यक दस्तावेजों के नाम पर आधार की भी मांग कर रहे हैं। यूआईडीएआई के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अजय भूषण पांडेय ने पीटीआई भाषा से कहा, ‘‘यह ठीक नहीं है। यह कानून के प्रावधानों के अनुसार नहीं है। स्कूलों में दाखिले तथा बच्चों की अन्य सुविधाओं के लिये आधार मुहैया कराना अनिवार्य नहीं किया जा सकता है।’’ यूआईडीएआई ने स्कूलों तथा उनके प्रबंधन को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि किसी भी बच्चे को आधार के चलते दाखिले से वंचित नहीं रहना पड़े। उन्होंने कहा, ‘‘दरअसल विद्यालयों को चाहिये वे बच्चों को बिना आधार के प्रवेश दें और यह सुनिश्चित करें कि प्रवेश के बाद विशेष शिविर लगाकर उनका आधार कार्ड बनवाया जाए।’’ पांडेय ने कहा कि जो निजी स्कूल नर्सरी में प्रवेश के लिए आधार की मांग करेंगे, यह सीधे रुप से उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना होगी।
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कंप्यूटर और डेटा की निगरानी को लेकर नया नोटिसफिकेशन जारी किया है। इसके तहत आइटी कानून 2000 और 2009 में विशेष परिस्थितियों में जांच व सुरक्षा एजेंसियों को लोगों के निजी कंप्यूटर नेटवर्क की निगरानी का अधिकार दिया गया है। लेकिन सचिव की अनुमति के बिना किसी के कंप्यूटर की निगरानी नहीं की जा सकती है। सरकार का कहना है कि देश में आतंकवाद और साइबर अपराध के बढ़ते खतरे को देखते हुए निगरानी के तंत्र को सुचारू रूप देना जरूरी है।
गृह मंत्रालय ने आईटी एक्ट, 2000 के 69 (1) के तहत यह आदेश दिया है जिसमें कहा गया है कि भारत की एकता और अखंडता के अलावा देश की रक्षा और शासन व्यवस्था बनाए रखने के लिहाज से जरूरी लगे तो केंद्र सरकार किसी एजेंसी को जांच के लिए आपके कंप्यूटर को एक्सेस करने की इजाजत दे सकती है। देश की दस केंद्रीय एजेंसियां अब किसी भी कंप्यूटर में मौजूद, रिसीव और सुरक्षित डेटा समेत किसी भी जानकारी की निगरानी, इंटरसेप्ट और डिक्रिप्ट कर सकती हैं। लेकिन यह निगरानी केवल गृह सचिव की अनुमति से ही की जा सकती है। इसके अनुसार सभी सब्सक्राइबर या सर्विस प्रोवाइडर और कंप्यूटर के मालिक को जांच एजेंसियों को तकनीकी सहयोग देना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें 7 साल की सज़ा देने के साथ जुर्माना लगाया लगाया जा सकता है। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह आशंका निराधार है कि एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति के कंप्यूटर की निगरानी का असीमित अधिकार दे दिया गया है। इसी तरह राज्यों में एजेंसियों को मुख्य सचिव की अनुमति से निगरानी का अधिकार पहले से है।
गृह मंत्रालय के अनुसार समस्या यह थी कि कोई भी एजेंसी गृह सचिव से किसी व्यक्ति के निजी कंप्यूटर की जांच के लिए अनुमति की मांग कर देता था। इस स्थिति से बचने के लिए निगरानी करने वाली एजेंसियों को सुनिश्चित कर दिया गया है। अब केवल खुफिया ब्यूरो, नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, राजस्व आसूचना निदेशालय, सीबीआइ, एनआइए, रॉ जम्मू-कश्मीर, असम व पूर्वोत्तर में कार्यरत डायरेक्टोरेट आफ सिंगल इंटेलीजेंस और दिल्ली पुलिस को ही किसी की कंप्यूटर की निगरानी का अधिकार होगा। दूसरी कोई भी एजेंसी निगरानी नहीं कर सकेगी। दस एजेंसियों को निगरानी के अधिकार का नोटिफिकेशन गृह मंत्रालय में ताजा बने साइबर सुरक्षा विभाग की ओर जारी किया गया है। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि साइबर सुरक्षा विभाग ने देश में आतंकवाद और साइबर अपराध के विश्लेषण के बाद निगरानी तंत्र को सुचारू करने की जरूरत महसूस की और इसके बाद ही दस एजेंसियों को इसके लिए चिह्नित किया गया।
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कंप्यूटर और डेटा की निगरानी को लेकर नया नोटिसफिकेशन जारी किया है। इसके तहत आइटी कानून 2000 और 2009 में विशेष परिस्थितियों में जांच व सुरक्षा एजेंसियों को लोगों के निजी कंप्यूटर नेटवर्क की निगरानी का अधिकार दिया गया है। लेकिन सचिव की अनुमति के बिना किसी के कंप्यूटर की निगरानी नहीं की जा सकती है। सरकार का कहना है कि देश में आतंकवाद और साइबर अपराध के बढ़ते खतरे को देखते हुए निगरानी के तंत्र को सुचारू रूप देना जरूरी है।
गृह मंत्रालय ने आईटी एक्ट, 2000 के 69 (1) के तहत यह आदेश दिया है जिसमें कहा गया है कि भारत की एकता और अखंडता के अलावा देश की रक्षा और शासन व्यवस्था बनाए रखने के लिहाज से जरूरी लगे तो केंद्र सरकार किसी एजेंसी को जांच के लिए आपके कंप्यूटर को एक्सेस करने की इजाजत दे सकती है। देश की दस केंद्रीय एजेंसियां अब किसी भी कंप्यूटर में मौजूद, रिसीव और सुरक्षित डेटा समेत किसी भी जानकारी की निगरानी, इंटरसेप्ट और डिक्रिप्ट कर सकती हैं। लेकिन यह निगरानी केवल गृह सचिव की अनुमति से ही की जा सकती है। इसके अनुसार सभी सब्सक्राइबर या सर्विस प्रोवाइडर और कंप्यूटर के मालिक को जांच एजेंसियों को तकनीकी सहयोग देना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें 7 साल की सज़ा देने के साथ जुर्माना लगाया लगाया जा सकता है। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह आशंका निराधार है कि एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति के कंप्यूटर की निगरानी का असीमित अधिकार दे दिया गया है। इसी तरह राज्यों में एजेंसियों को मुख्य सचिव की अनुमति से निगरानी का अधिकार पहले से है।
गृह मंत्रालय के अनुसार समस्या यह थी कि कोई भी एजेंसी गृह सचिव से किसी व्यक्ति के निजी कंप्यूटर की जांच के लिए अनुमति की मांग कर देता था। इस स्थिति से बचने के लिए निगरानी करने वाली एजेंसियों को सुनिश्चित कर दिया गया है। अब केवल खुफिया ब्यूरो, नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, राजस्व आसूचना निदेशालय, सीबीआइ, एनआइए, रॉ जम्मू-कश्मीर, असम व पूर्वोत्तर में कार्यरत डायरेक्टोरेट आफ सिंगल इंटेलीजेंस और दिल्ली पुलिस को ही किसी की कंप्यूटर की निगरानी का अधिकार होगा। दूसरी कोई भी एजेंसी निगरानी नहीं कर सकेगी। दस एजेंसियों को निगरानी के अधिकार का नोटिफिकेशन गृह मंत्रालय में ताजा बने साइबर सुरक्षा विभाग की ओर जारी किया गया है। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि साइबर सुरक्षा विभाग ने देश में आतंकवाद और साइबर अपराध के विश्लेषण के बाद निगरानी तंत्र को सुचारू करने की जरूरत महसूस की और इसके बाद ही दस एजेंसियों को इसके लिए चिह्नित किया गया।
सिद्धार्थ नगर (उत्तर प्रदेश)। भ्रष्टाचार के दीमक ने देश की प्रशासन व्यवस्था को इतना खोखला कर दिया है कि सरकारी विभागों में बिना रिश्वत कोई काम होना मुश्किल हो गया है। सिद्धार्थ नगर के एक बुजुर्ग शिक्षक को रिश्वतोखोरी की वजह से अपनी पेंशन पाने की लड़ाई 17 साल तक लड़नी पड़ी। हालांकि भारी मानसिक प्रताड़ना झेलने के बावजूद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खण्डपीठ के आदेश के बाद अपना हक प्राप्त ही कर लिया।
वेद प्रकाश लाल श्रीवास्तव सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगड़ के शिवपति इंटर कालेज में 1971 में नागरिक शास्त्र विषय के प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुए थे। 2001 में 30 साल की सेवा के बाद 2001 में वह सेवानिवृत्त हो गए। वह पेंशन लेने के लिए शिक्षा विभाग, बस्ती पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि सभी कागजात सही न भेजे जाने के की वजह से उनकी पेंशन कम बनाई गई है। जब इसके बारे में शिक्षा विभाग के कर्मचारी से पूछा तो उसने बताया कि रिश्वत न देने के कारण उनकी पेंशन कम बनाई गयी है। कर्मचारी की इस बात से हैरान वेद प्रकाश अगले चार सालों तक पेंशन ठीक कराने के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे और शिक्षा निदेशक माध्यमिक, लखनऊ को भी पत्र लिखकर जानकारी दी। वहां से बस्ती कार्यालय को पेंशन ठीक करने का निर्देश भी मिला, लेकिन रिश्वतखोरी के आदी हो चुके कर्मचारियों ने निर्देश को अनदेखा कर दिया। इससे परेशान वेद प्रकाश ने 2005 में सिद्धार्थ नगर के उपभोक्ता फोरम में वाद दाखिल किया, वहां से भी पेंशन ठीक करने का आदेश दिया गया, लेकिन फिर कर्मचारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। इतना ही नहीं तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने भी इस मामले में सुधार के निर्देश दिए, लेकिन फिर भी कर्मचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
आखिरकर मंत्री से लेकर संतरी तक दौड़-भाग के बाद भी निराश वेद प्रकाश ने 2010 में उच्च न्यायालय की लखनऊ खंड पीठ में याचिका दाखिल की। उच्च न्यायालय ने तीन बार विभाग को निर्देश दिए, लेकिन विभाग ने बार-बार प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया। अंतत: 30 जुलाई 2018 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंड पीठ ने वेद प्रकाश के हक में फैसला सुनाते हुए आठ फीसद ब्याज के साथ अवशेष भुगतान करने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद शिक्षा विभाग को उनका अधिकार देना पड़ा। 17 साल की लंबी लड़ाई के बाद अपनी इस जीत से खुश वेद प्रकाश लाल श्रीवास्तव का कहना है कि भ्रष्टाचार को कम करने के लिए भ्रष्टाचार के जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। जब तक वे कार्रवाई से बचते रहेंगे, भ्रष्टाचार करते रहेंगे। इस जीत के बाद वह अब जिम्मेदारों पर कार्रवाई के लिए भी लड़ेंगे।
नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर बहुत अहम फैसला लिया है। अब बैंक में खाता खुलवाने या मोबाइल का सिम कार्ड खरीदते समय आधार कार्ड की मांग करना गैरकानूनी होगा। ऐसा करने पर बैंक या टेलीकॉम कंपनी के कर्माचरी पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना और 3 साल से लेकर 10 साल तक की जेल भी हो सकती है। केंद्र सरकार ने सोमवार को इसे कानून का रूप देने के लिए प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट और भारतीय टेलिग्राफ ऐक्ट में संशोधन को मंजूरी प्रदान कर दी।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट और भारतीय टेलिग्राफ ऐक्ट में संशोधन के तहत पहचान और पते के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड के लिए दबाव बनाने पर बैंक और टेलिकॉम कंपनियों को एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। आधार कार्ड मांगने वाले कर्मचारी अथवा जिम्मेदार व्यक्ति को तीन से 10 साल तक की कैद की सजा भी हो सकती है। अब उपभोक्ता आधार कार्ड के स्थान पर पासपोर्ट, राशन कार्ड या फिर कोई अन्य दस्तावेज भी दिखा सकते हैं। बैंक या टेलीकाम कंपनी को आधार कार्ड दिखाने के लिए दबाव डालने का अधिकार नहीं है। अब ये पूरी तरह से उपभोक्ता की इच्छा पर निर्भर होगा कि वह सिम कार्ड या बैंक खाते के लिए आधार कार्ड देना चाहता है या नहीं देना चाहता है ।
नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर बहुत अहम फैसला लिया है। अब बैंक में खाता खुलवाने या मोबाइल का सिम कार्ड खरीदते समय आधार कार्ड की मांग करना गैरकानूनी होगा। ऐसा करने पर बैंक या टेलीकॉम कंपनी के कर्माचरी पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना और 3 साल से लेकर 10 साल तक की जेल भी हो सकती है। केंद्र सरकार ने सोमवार को इसे कानून का रूप देने के लिए प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट और भारतीय टेलिग्राफ ऐक्ट में संशोधन को मंजूरी प्रदान कर दी।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट और भारतीय टेलिग्राफ ऐक्ट में संशोधन के तहत पहचान और पते के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड के लिए दबाव बनाने पर बैंक और टेलिकॉम कंपनियों को एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। आधार कार्ड मांगने वाले कर्मचारी अथवा जिम्मेदार व्यक्ति को तीन से 10 साल तक की कैद की सजा भी हो सकती है। अब उपभोक्ता आधार कार्ड के स्थान पर पासपोर्ट, राशन कार्ड या फिर कोई अन्य दस्तावेज भी दिखा सकते हैं। बैंक या टेलीकाम कंपनी को आधार कार्ड दिखाने के लिए दबाव डालने का अधिकार नहीं है। अब ये पूरी तरह से उपभोक्ता की इच्छा पर निर्भर होगा कि वह सिम कार्ड या बैंक खाते के लिए आधार कार्ड देना चाहता है या नहीं देना चाहता है ।
चंडीगढ़ । (हरियाणा) । हरियाणा उच्चतर शिक्षा विभाग ने प्रदेश के सरकारी कॉलेजों के लिए एक 'शिक्षा सेतु' नाम का एप जारी किया है। इस एप के जरिए अब कॉलेज छात्र अपनी हाजिरी भरने के अलावा फीस का ऑनलाइन भुगतान भी कर सकते हैं। सरकारी कॉलेजों में विद्यार्थियों की हाजिरी, फीस, ऑनलाइन एडमिशन, स्कॉलरशिप के अलावा लेक्चरर एवं निदेशालय के अधिकारियों का विवरण ऑनलाइन मिलेगा।
उच्चतर शिक्षा विभाग के निदेशक ए श्रीनिवास के अनुसार ‘शिक्षा सेतु’ मोबाइल एप शुरू करने से जहां विभाग व कॉलेज प्रशासन में पारदर्शिता आएगी, वहीं विद्यार्थियों, अभिभावकों, अध्यापकों एवं प्रशासन के मध्य संपर्क बेहतर होगा। अब विद्यार्थियों की हाजिरी भी ऑनलाइन लगेगी, जिसमें केवल 15 दिनों के भीतर अपडेट संभव है। एप के माध्यम से अब विद्यार्थियों और अध्यापकों को विभाग के आवश्यक नोटिस, सर्कुलर एवं अन्य कार्यक्रमों की जानकारी तत्काल मिलेगी। विभाग की इस शुरुआत से जहां विद्यार्थी ऑनलाइन फीस भर सकता है, वहीं एक क्लिक से कॉलेज प्रशासन यह पता कर सकेगा कि किस विद्यार्थी की फीस बकाया है और अब तक कुल कितनी फीस एकत्रित हो चुकी है। श्रीनिवास ने बताया कि एप के जरिए एडमिशन के समय विद्यार्थी यह पता कर सकेंगे कि किस कॉलेज में कौन से विषय या कोर्स की कितनी सीटें हैं। पहले जो विद्यार्थी जानकारी के अभाव में स्कॉलरशिप प्राप्त करने से वंचित रह जाते थे, ‘शिक्षा सेतु’ मोबाइल एप के माध्यम से विभाग या कॉलेज द्वारा दी जाने वाली सभी स्कॉलरशिप का विवरण व योग्यता की शर्तें घर बैठे प्राप्त कर सकेंगे। असाइनमेंट व नोटिफिकेशन की जानकारी भी तुरंत मिल सकेगी।
चंडीगढ़ । (हरियाणा) । हरियाणा उच्चतर शिक्षा विभाग ने प्रदेश के सरकारी कॉलेजों के लिए एक 'शिक्षा सेतु' नाम का एप जारी किया है। इस एप के जरिए अब कॉलेज छात्र अपनी हाजिरी भरने के अलावा फीस का ऑनलाइन भुगतान भी कर सकते हैं। सरकारी कॉलेजों में विद्यार्थियों की हाजिरी, फीस, ऑनलाइन एडमिशन, स्कॉलरशिप के अलावा लेक्चरर एवं निदेशालय के अधिकारियों का विवरण ऑनलाइन मिलेगा।
उच्चतर शिक्षा विभाग के निदेशक ए श्रीनिवास के अनुसार ‘शिक्षा सेतु’ मोबाइल एप शुरू करने से जहां विभाग व कॉलेज प्रशासन में पारदर्शिता आएगी, वहीं विद्यार्थियों, अभिभावकों, अध्यापकों एवं प्रशासन के मध्य संपर्क बेहतर होगा। अब विद्यार्थियों की हाजिरी भी ऑनलाइन लगेगी, जिसमें केवल 15 दिनों के भीतर अपडेट संभव है। एप के माध्यम से अब विद्यार्थियों और अध्यापकों को विभाग के आवश्यक नोटिस, सर्कुलर एवं अन्य कार्यक्रमों की जानकारी तत्काल मिलेगी। विभाग की इस शुरुआत से जहां विद्यार्थी ऑनलाइन फीस भर सकता है, वहीं एक क्लिक से कॉलेज प्रशासन यह पता कर सकेगा कि किस विद्यार्थी की फीस बकाया है और अब तक कुल कितनी फीस एकत्रित हो चुकी है। श्रीनिवास ने बताया कि एप के जरिए एडमिशन के समय विद्यार्थी यह पता कर सकेंगे कि किस कॉलेज में कौन से विषय या कोर्स की कितनी सीटें हैं। पहले जो विद्यार्थी जानकारी के अभाव में स्कॉलरशिप प्राप्त करने से वंचित रह जाते थे, ‘शिक्षा सेतु’ मोबाइल एप के माध्यम से विभाग या कॉलेज द्वारा दी जाने वाली सभी स्कॉलरशिप का विवरण व योग्यता की शर्तें घर बैठे प्राप्त कर सकेंगे। असाइनमेंट व नोटिफिकेशन की जानकारी भी तुरंत मिल सकेगी।
नई दिल्ली । बैंकों और मोबाइल फोन के ग्राहकों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार आधार कानून में संशोधन करने जा रही है। इसमें सरकार बैंकों और मोबाइल कंपनियों के ग्राहकों को ईकेवाईसी के लिए आधार का विकल्प देने जा रही है। जो अनिवार्य न हो कर वैकल्पिक होगा । ग्राहक चाहे तो ईकेवाईसी का इस्तेमाल करे या न करें, यह उसके विवेक पर निर्भर होगा।
बताया जा रहा है कि इलेक्ट्रानिक व सूचना प्रद्यौगिकी मंत्रालय ने बैंको और मोबाइल कंपनियों के लिए ईकेवाईसी के वैकल्पिक इस्तेमाल के संशोधन प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। सरकार इस संशोधन प्रस्ताव के विधेयक को मौजूदा शीतकालीन सत्र में पेश कर सकती है। इस कानून के बन जाने के बाद ग्राहक के पास बैंक खातों और मोबाइल सिम खरीदने के लिए ईकेवाईसी के रुप में आधार के इस्तेमाल का भी विकल्प रहेगा। जबकि कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अहम फैसले में आधार अधिनियम की धारा 57 को खत्म कर दिया था। जिसके तहत सरकार से मिलने वाली सभी सब्सिडी और छात्रवृत्तियों को छोड़कर बाकी चीजों के लिए आधार के इस्तेमाल करने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया था कि सरकार मौजूदा कानून में बदलव करेगी।
नई दिल्ली । बैंकों और मोबाइल फोन के ग्राहकों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार आधार कानून में संशोधन करने जा रही है। इसमें सरकार बैंकों और मोबाइल कंपनियों के ग्राहकों को ईकेवाईसी के लिए आधार का विकल्प देने जा रही है। जो अनिवार्य न हो कर वैकल्पिक होगा । ग्राहक चाहे तो ईकेवाईसी का इस्तेमाल करे या न करें, यह उसके विवेक पर निर्भर होगा।
बताया जा रहा है कि इलेक्ट्रानिक व सूचना प्रद्यौगिकी मंत्रालय ने बैंको और मोबाइल कंपनियों के लिए ईकेवाईसी के वैकल्पिक इस्तेमाल के संशोधन प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। सरकार इस संशोधन प्रस्ताव के विधेयक को मौजूदा शीतकालीन सत्र में पेश कर सकती है। इस कानून के बन जाने के बाद ग्राहक के पास बैंक खातों और मोबाइल सिम खरीदने के लिए ईकेवाईसी के रुप में आधार के इस्तेमाल का भी विकल्प रहेगा। जबकि कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अहम फैसले में आधार अधिनियम की धारा 57 को खत्म कर दिया था। जिसके तहत सरकार से मिलने वाली सभी सब्सिडी और छात्रवृत्तियों को छोड़कर बाकी चीजों के लिए आधार के इस्तेमाल करने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संकेत दिया था कि सरकार मौजूदा कानून में बदलव करेगी।
देहरादून (उत्तराखंड) । यदि आप वाहन चालक हैं तो सावधान हो जाएं, क्योंकि अब आपको यातायात नियमों का उल्लंघन करना महंगा पड़ेगा। प्रदेश शासन ने यातायात नियमों को तोड़ने वाले वाहन चालकों के खिलाफ जुर्माने की राशि को बढ़ा दिया है। अब खतरनाक ढंग से वाहन चलाने और वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करने पर वाहन चालक को 500 की जगह 1000 रुपये का जुर्माना भरना होगा। इतना ही नहीं इसके अलावा अन्य चालान के जुर्माने की राशि में भी बढ़ोतरी कर दी गयी है।
यातायात निदेशक केवल खुराना के अनुसार मोटरयान अधिनियम में दिए गए निर्देशों का अनुपालन न करने पर उप निरीक्षक को पांच सौ रुपये तक के चालान करने का अधिकार दिया गया है। खतरनाक ढंग से वाहन चलाने और वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करने पर 1000 रुपये का जुर्माना और जबकि नियमों के उल्लंघन में पकड़े जाने के दौरान गलत सूचना देने और जानकारी छिपाने पर भी 500 रुपये जुर्माना देना होगा। वहीं शारीरिक तौर से अक्षम होने की स्थिति में वाहन चलाते हुए पकड़े जाने पर 200 रुपये का चालान काटा जाएगा। हालांकि बिना हेलमेट के वाहन चलाने पर जुर्माना अभी भी 100 रुपये ही निर्धारित है। हालांकि बिना हेलमेट के वाहन चलाने पर जुर्माना राशि बढ़ाने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। उप निरीक्षक स्तर के नीचे किसी को भी चालान करने का अधिकार नहीं दिया गया है। यह नियम सीपीयू पर भी लागू होगा।
देहरादून (उत्तराखंड) । यदि आप वाहन चालक हैं तो सावधान हो जाएं, क्योंकि अब आपको यातायात नियमों का उल्लंघन करना महंगा पड़ेगा। प्रदेश शासन ने यातायात नियमों को तोड़ने वाले वाहन चालकों के खिलाफ जुर्माने की राशि को बढ़ा दिया है। अब खतरनाक ढंग से वाहन चलाने और वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करने पर वाहन चालक को 500 की जगह 1000 रुपये का जुर्माना भरना होगा। इतना ही नहीं इसके अलावा अन्य चालान के जुर्माने की राशि में भी बढ़ोतरी कर दी गयी है।
यातायात निदेशक केवल खुराना के अनुसार मोटरयान अधिनियम में दिए गए निर्देशों का अनुपालन न करने पर उप निरीक्षक को पांच सौ रुपये तक के चालान करने का अधिकार दिया गया है। खतरनाक ढंग से वाहन चलाने और वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करने पर 1000 रुपये का जुर्माना और जबकि नियमों के उल्लंघन में पकड़े जाने के दौरान गलत सूचना देने और जानकारी छिपाने पर भी 500 रुपये जुर्माना देना होगा। वहीं शारीरिक तौर से अक्षम होने की स्थिति में वाहन चलाते हुए पकड़े जाने पर 200 रुपये का चालान काटा जाएगा। हालांकि बिना हेलमेट के वाहन चलाने पर जुर्माना अभी भी 100 रुपये ही निर्धारित है। हालांकि बिना हेलमेट के वाहन चलाने पर जुर्माना राशि बढ़ाने का प्रस्ताव भी विचाराधीन है। उप निरीक्षक स्तर के नीचे किसी को भी चालान करने का अधिकार नहीं दिया गया है। यह नियम सीपीयू पर भी लागू होगा।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) । प्रदेश की कानून व्यवस्था को ध्यान रखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता की सुरक्षा के लिए अहम कदम उठाया है। मुख्यमंत्री ने 23 जिलों के 36 विधानसभा क्षेत्रों में नए थाने खोलने के लिए गृह विभाग के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। अब गृह विभाग ने पुलिस मुख्यालय को पत्र भेजकर इन जिलों के कप्तानों से नए थानों के लिए विस्तृत प्रस्ताव मांगा है।
बताया जा रहा है कि प्रस्तावित 36 नए थानों में सर्वाधिक तीन थाने गाजियाबाद जिले लोनी, साहिबाबाद और मुरादनगर विधानसभा क्षेत्रों में खोले जाएंगे। जबकि लखनऊ में बख्शी का तालाब और सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्रों में एक-एक थाना खोलने की योजना है। इसके अलावा नोएडा के नोएडा शहर व दादरी विधानसभा क्षेत्रों में भी एक-एक थाने खुलेंगे। वहीं, अलीगढ़ के छर्रा व इगलास विधानसभा क्षेत्र में एक-एक, लखीमपुर खीरी के पलिया व सिंघासन विधानसभा क्षेत्र में, सिद्धार्थनगर के शोहरतगढ़ व डुमरियागंज, सीतापुर के मिश्रिख व सीतापुर सदर, बलरामपुर के बलरामपुर व उतरौला और संतकबीरनगर के आलापुर व मेंहदावल विधानसभा क्षेत्रों में एक-एक थाने स्थापित किए जाने की तैयारी है। इसके अलावा बुलंदशहर के सिंकदराबाद, फिरोजाबाद के टुंडला, प्रतापगढ़ के विश्वनाथगंज, कानपुर देहात के रसूलाबाद, कानपुर नगर के बिठूर, अमरोहा के हसनपुर, मथुरा, आगरा के आगरा उत्तरी, उन्नाव, अमेठी, कौशांबी के सिराथू, बहराइच के नानपारा और श्रावस्ती के श्रावस्ती विधानसभा क्षेत्र में नए थाने खोलने की योजना है।
इस योजना के तहत गृह विभाग ने 36 थानों के अलावा 13 नई पुलिस चौकियां स्थापित करने की कवायद तेज कर दी है। इसके तहत बागपत, गौतमबुद्धनगर, मथुरा, संभल, संभल, प्रतापगढ़, फर्रुखाबाद, बाराबंकी, बलरामपुर, गोंडा, आगरा के एत्मादपुर व फतेहाबाद में एक-एक पुलिस चौकी स्थापित करने की योजना है।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) । प्रदेश की कानून व्यवस्था को ध्यान रखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता की सुरक्षा के लिए अहम कदम उठाया है। मुख्यमंत्री ने 23 जिलों के 36 विधानसभा क्षेत्रों में नए थाने खोलने के लिए गृह विभाग के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है। अब गृह विभाग ने पुलिस मुख्यालय को पत्र भेजकर इन जिलों के कप्तानों से नए थानों के लिए विस्तृत प्रस्ताव मांगा है।
बताया जा रहा है कि प्रस्तावित 36 नए थानों में सर्वाधिक तीन थाने गाजियाबाद जिले लोनी, साहिबाबाद और मुरादनगर विधानसभा क्षेत्रों में खोले जाएंगे। जबकि लखनऊ में बख्शी का तालाब और सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्रों में एक-एक थाना खोलने की योजना है। इसके अलावा नोएडा के नोएडा शहर व दादरी विधानसभा क्षेत्रों में भी एक-एक थाने खुलेंगे। वहीं, अलीगढ़ के छर्रा व इगलास विधानसभा क्षेत्र में एक-एक, लखीमपुर खीरी के पलिया व सिंघासन विधानसभा क्षेत्र में, सिद्धार्थनगर के शोहरतगढ़ व डुमरियागंज, सीतापुर के मिश्रिख व सीतापुर सदर, बलरामपुर के बलरामपुर व उतरौला और संतकबीरनगर के आलापुर व मेंहदावल विधानसभा क्षेत्रों में एक-एक थाने स्थापित किए जाने की तैयारी है। इसके अलावा बुलंदशहर के सिंकदराबाद, फिरोजाबाद के टुंडला, प्रतापगढ़ के विश्वनाथगंज, कानपुर देहात के रसूलाबाद, कानपुर नगर के बिठूर, अमरोहा के हसनपुर, मथुरा, आगरा के आगरा उत्तरी, उन्नाव, अमेठी, कौशांबी के सिराथू, बहराइच के नानपारा और श्रावस्ती के श्रावस्ती विधानसभा क्षेत्र में नए थाने खोलने की योजना है।
इस योजना के तहत गृह विभाग ने 36 थानों के अलावा 13 नई पुलिस चौकियां स्थापित करने की कवायद तेज कर दी है। इसके तहत बागपत, गौतमबुद्धनगर, मथुरा, संभल, संभल, प्रतापगढ़, फर्रुखाबाद, बाराबंकी, बलरामपुर, गोंडा, आगरा के एत्मादपुर व फतेहाबाद में एक-एक पुलिस चौकी स्थापित करने की योजना है।