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चंबा (हिमाचल प्रदेश)। पुलिस कर्मियों से बदसलूकी करना अब लोगों को मंहगा पड़ सकता है। इसके लिए चंबा शहर की पुलिस तकनीकि का सहारा लेने जा रही है। पुलिस विभाग पुलिसकर्मियों की वर्दी में बॉडी वार्न कैमरे लगवा रही है। इसमें पुलिसकर्मी और जनता की हर गतिविधि रिकॉर्ड होगी। जिससे पुलिसकर्मी या जनता एक दूसरे पर बदसलूकी का झूठा आरोप नहीं लगा सकेंगे।
आपको बता दें कि पुलिसकर्मियों से आए दिन बदसलूकी और जनता के आरोपों से परेशान होकर चंबा शहर के पुलिस विभाग ने सीसीटीएनएस प्रोजेक्ट के तहत कैमरों की खरीददारी की है । जीपीएस के जरिए वर्दी में लगे इन बॉडी वार्न कैमरों का कंट्रोल रुम पुलिस अधीक्षक के पास रहेगा। बॉडी वार्न कैमरे 4जी, वाईफाई और जीपीएस सुविधा से लैस होंगे। एक कैमरे की कीमत 12 से 25 हजार रुपये के बीच बतायी जा रही है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत 18 कैमरे ट्रैफिक पुलिस को दिए हैं। 31 दिन बाद कैमरे से वीडियो फुटेज स्वयं ही डिलीट हो जाएगी। इसलिए अब यदि कोई भी व्यक्ति पुलिसकर्मी से बदतमीजी करता है तो उसकी गतिविधि इस कैमरे में कैद हो जाएगी। इतना ही नहीं यदि पुलिसकर्मी भी जनता से गलत व्यवहार करता है तो उसकी गतिविधि भी इस कैमरे में कैद हो जाएगी। इसके जरिए पेट्रोलिंग और मौका-ए-वारदात पर भी रिकार्डिंग हो सकेगी। किसी केस की जांच में पूछताछ के दौरान रिकार्डिंग की सुविधा हो सकेगी। ट्रैफिक पुलिस कर्मचारी भी इसका इस्तेमाल करेंगे। धरने, प्रदर्शनों की समीक्षा तथा सबूत जुटाने में आसानी होगी। पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतें और आरोप कम होंगे। पुलिसकर्मियों से दुर्व्यवहार और हमलों के मामले में कमी आएगी। और इससे कानून व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
बड़वानी (मध्य प्रदेश)। प्रशासनिक अधिकारियों ने ऐसा अनोखा कारनामा कर दिखाया है, जिसे पढ़कर आप हैरान रह जाएंगे। बड़वानी में दो भाई खुद को जिंदा साबित करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के यहां चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अधिकारी उन्हें जिंदा मानने को तैयार ही नहीं हैं। पीड़ितों भाइयों ने अब कलेक्टर और एसपी से मामले की शिकायत की है। दरअसल पीड़ित भाइयों के बड़े भाई ने दोनों को मृत साबित करके उनकी पैतृक जमीन अपने नाम करवा ली है।
बड़वानी जिले की पाटी तहसील के ग्राम बूदी निवासी बिलौर सिंह व राजा राम सिंह पिता कन सिंह ने अपनी अनोखी आप बीती सुनाई। उन्होंने बताया कि बड़ा भाई व मां गांव में ही रह रहे हैं और हम दो भाई करीब 35 साल से देवास जिले के ग्राम लेहकी में रह रहे हैं। हर साल जमीन को बंटाई पर देने के लिए हम दोनों भाई गांव आते हैं। पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई भूर सिंह ने कुछ लोगों के साथ मिलकर कूटरचित दस्तावेज बनाकर हमारी 3 एकड़ पैतृक जमीन हड़प ली है और हमें जमीन से बेदखल कर दिया है। इसमें मुझे कुंवारा बताकर मृत बता दिया है और एकमात्र जिंदा वारिस भूर सिंह को बताया है, जबकि मां उंदरीबाई, मेरी पत्नी व पांच बेटे और तीन बेटियां और छोटे भाई राजाराम के 10 बच्चों समेत 25 लोगों से अधिक लोगों को मृत घोषित करवा दिया है। इतना ही नहीं इसके लिए ग्राम पंचायत ने बकायदा मृत्यु प्रमाण-पत्र भी जारी कर दिए हैं।
उन्होंने बताया कि हमने ग्राम पंचायत, पटवारी, तहसीलदार व पुलिस को इस विषय में सारी बात विस्तार से बताई, लेकिन वे हमें जिंदा मानकर कार्रवाई करने को तैयार ही नहीं हैं। ऐसी दशा में अब हम क्या सबूत दें और कैसे बताएं कि हम जिंदा हैं। हमने परेशान होकर कलेक्टर व एसपी के नाम आवेदन सौंपा है और निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने और उनकी जमीन दिलाने की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्दी उन्हें न्याय नहीं मिला तो वह भोपाल जाकर उच्च अधिकारियों व मुख्यमंत्री को मामले की शिकायत करेंगे।
रांची (झारखंड)। राज्य में फर्जी जमानतदारों की अब खैर नहीं है। राज्य सरकार के गृह विभाग ने उन पर लगाम लगाने की कवायद शुरु कर दी है। इसके तहत अब सिर्फ आधार धारक व्यक्ति ही जमानतदार बन सकेगा। ऐसे जमानतदार की पहचान का पता लगाने के लिए अदालतों में लगे बायोमीट्रिक सिस्टम पर अंगूठे का निशान लिया जाएगा। इस योजना के लागू होने पर इसका भी पता चल जाएगा कि जमानतदार ने इससे पहले कितने लोगों की जमानत ली है। अदालत के आदेश के बाद राज्य सरकार फर्जी जमानतदारों से निपटने के लिए इस योजना पर काम कर रही है।
इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए राज्य का गृह विभाग गाइडलाइन तैयार कर रहा है। इसके लिए पुलिस मुख्यालय और अभियोजन निदेशालय का भी सहयोग लिया जा रहा है। इस योजना के तहत सभी अदालतों में बायोमीट्रिक सिस्टम लगाया जाएगा और उससे जमानतदारों की पहचान की जाएगी। जमानतदारों का पहचान पत्र एवं संपत्ति का शपथ पत्र अदालत में दाखिल करना होगा ताकि सूचना गलत होने पर उन पर कार्यवाही हो सके। जमानतदारों का भौतिक सत्यापन थाना के माध्यम से होगा। सभी जिला एवं अनुमंडल अदालतों में जमानतदारों की प्रोफाइल रखने के लिए साफ्टवेयर बना जाएगा, जिससे जमानतदार द्वार बार-बार एक दस्तावेज के उपयोग से रोका जा सके। जमानतदारों के चल-अचल संपत्ति का ऑनलाइन जांच के लिए न्यायालय में व्यवस्था की जाएगी। गृह विभाग के प्रधान सचिव एस के जी रहाटे का कहना है कि अभियोजन निदेशालय, पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग मिलकर इसके लिए गाइडलाइन तैयार कर रहा है। चार से छह सप्ताह में इसको तैयार कर लिया जाएगा।
रांची (झारखंड)। राज्य में फर्जी जमानतदारों की अब खैर नहीं है। राज्य सरकार के गृह विभाग ने उन पर लगाम लगाने की कवायद शुरु कर दी है। इसके तहत अब सिर्फ आधार धारक व्यक्ति ही जमानतदार बन सकेगा। ऐसे जमानतदार की पहचान का पता लगाने के लिए अदालतों में लगे बायोमीट्रिक सिस्टम पर अंगूठे का निशान लिया जाएगा। इस योजना के लागू होने पर इसका भी पता चल जाएगा कि जमानतदार ने इससे पहले कितने लोगों की जमानत ली है। अदालत के आदेश के बाद राज्य सरकार फर्जी जमानतदारों से निपटने के लिए इस योजना पर काम कर रही है।
इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए राज्य का गृह विभाग गाइडलाइन तैयार कर रहा है। इसके लिए पुलिस मुख्यालय और अभियोजन निदेशालय का भी सहयोग लिया जा रहा है। इस योजना के तहत सभी अदालतों में बायोमीट्रिक सिस्टम लगाया जाएगा और उससे जमानतदारों की पहचान की जाएगी। जमानतदारों का पहचान पत्र एवं संपत्ति का शपथ पत्र अदालत में दाखिल करना होगा ताकि सूचना गलत होने पर उन पर कार्यवाही हो सके। जमानतदारों का भौतिक सत्यापन थाना के माध्यम से होगा। सभी जिला एवं अनुमंडल अदालतों में जमानतदारों की प्रोफाइल रखने के लिए साफ्टवेयर बना जाएगा, जिससे जमानतदार द्वार बार-बार एक दस्तावेज के उपयोग से रोका जा सके। जमानतदारों के चल-अचल संपत्ति का ऑनलाइन जांच के लिए न्यायालय में व्यवस्था की जाएगी। गृह विभाग के प्रधान सचिव एस के जी रहाटे का कहना है कि अभियोजन निदेशालय, पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग मिलकर इसके लिए गाइडलाइन तैयार कर रहा है। चार से छह सप्ताह में इसको तैयार कर लिया जाएगा।
रुकड़ी (उत्तराखंड) । फर्जी मूल निवास प्रमाण पत्र के जरिए सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत एक व्यक्ति के कारनामे का उसकी पत्नी ने ही भंडाफोड़ दिया। पति से अलग रह रही महिला ने बेसिक शिक्षा अधिकारी से शिकायत की थी कि उसका पति फर्जी मूल निवास प्रमाण पत्र के जरिए शिक्षक पद पर कार्यरत है, इसलिए उसे नौकरी से निकाल दिए जाए। शिकायत मिलने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक) ब्रह्मपाल सिंह सैनी ने सहायक शिक्षक विश्वेश्वर प्रताप सिंह के प्रमाणपत्र को जांच के लिए एसआईटी के पास भेज दिया है।
आपको बता दें कि शिकायतकर्ता अनीता कुमारी निवासी अशोक विहार, संजय नगर बरेली ने बेसिक जिला शिक्षा अधिकारी को शिकायत कर बताया कि उनके पति विश्वेश्वर प्रताप सिंह वर्ष 2007 से जीयूपीएस संढौली नारसन में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने फर्जी मूल निवास प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल की है। जिसकी उन्होंने कई बार पत्र के माध्यम से अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे परेशान होकर उन्होंने सूचना का अधिकार में मूल निवास राजस्व अभिलेखों में दर्ज होने के विषय में उत्तर मांगा, लेकिन प्रथम जांच में मूल निवास प्रमाणपत्र अभिलेखों में दर्ज नहीं पाया गया। वहीं द्वितीय जांच में अपर जिला अधिकारी ने भी कलक्ट्रेट कार्यालय हरिद्वार के अभिलेखों के अनुसार दर्ज नहीं पाया।
इसके बाद अनिता कुमारी ने जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी से मिलकर पति के प्रमाणपत्रों की जांच कराते हुए उन्हें बर्खास्त करने, दंड के रूप में वेतन वसूलने और शिक्षा विभाग को गुमराह करने के लिए मुकदमा दर्ज करने की मांग की। जिला शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक) ब्रह्मपाल सिंह सैनी ने बताया कि मामला संज्ञान में आया है। फर्जी शिक्षकों की जांच एसआईटी कर रही है। विश्वेश्वर प्रताप सिंह के प्रमाणपत्र भी एसआईटी को भेज दिए गए हैं। और आगे की कार्यवाही की जा रही है।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) । चकबंदी मुख्यालय में लिपिक पदोन्नति धांधली मामले में एक पीसीएस समेत तीन अधिकारियों के खिलाफ हजरतगंज कोतवाली में केस दर्ज हो गया है। और इन्हें निलंबित भी कर दिया गया है। इन अधिकारियों पर 70 चपरासियों को टंकण परीक्षा में धांधली करके लिपिक बनाने का आरोप है। क्षेत्रीय सेवायोजन कार्यालय द्वारा तकनीकी विशेषज्ञ न होने की जानकारी देने के बावजूद, इन्होंने जानबूझकर परीक्षा लेने के लिए क्षेत्रीय सेवायोजन कार्यालय के अनुदेशक आशुलिपि को टंकण विशेषज्ञ नियुक्त करवाया था। और टंकण परीक्षा में धांधली करवाकर कर्मचारियों को पास करवाया था।
आपको बता दें कि चकबंदी विभाग में चपरासी के पद पर कार्यरत कर्मचारियों को प्रोन्नति के माध्यम से लिपिक बनाने के लिए 26 व 27 दिसंबर 2018 को टंकण परीक्षा आयोजित की गई थी। इस परीक्षा में हुई धांधली की लिखित शिकायत गोरखपुर के रहने वाले योगेन्द्र सिंह ने शासन से की थी। इसके बाद शासन ने मामले की जांच कृषि उत्पादन आयुक्त डॉ. प्रभात कुमार को सौंपी। जांच में टंकण परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका जताई गयी । जिसके बाद दोबारा राजकीय औद्योगिक परीक्षण संस्थान अलीगंज में 11 व 15 अप्रैल 2019 को टंकण परीक्षा करवायी गयी थी, जिसमें सभी 70 कर्मचारी असफल साबित हुए । इसके बाद उच्च स्तरीय जांच में दोषी पाये गए चयन समिति के अध्यक्ष व अपर संचालक चकबंदी सुरेश यादव, पीसीएस अधिकारी व तत्कालीन उप संचालक चकबंदी मुख्यालय छोटे लाल मिश्रा, संयुक्त संचालक चकबंदी रवींद्र कुमार दुबे के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत हजरतगंज कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया गया। और वहीं रवींद्र कुमार दुबे को निलंबित कर दिया गया है, जबकि सुरेश यादव पहले ही निलंबित किये जा चुके हैं। इन दोनों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर आरोप पत्र जारी कर दिया गया है। वहीं छोटे लाल मिश्रा को निलंबित करने और विभागीय कार्यवाही शुरू कर आरोप पत्र दिये जाने के लिए अपर मुख्य सचिव नियुक्ति विभाग को आरोप पत्र सहित पत्र भेजा गया है। जबकि चकबंदी आयुक्त शारदा सिंह पहले ही निलंबित हो चुकी हैं। गौरतलब है कि कृषि उत्पादन आयुक्त ने जांच में दोषी पाये गए अधिकारियों, कर्मचारियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने की सिफारिश की थी।
मध्य प्रदेश में पहले आपको अपनी जमीन से संबंधित कोई कागजात की आवश्यकता पड़ती थी तो आपको तहसील का चक्कर लगाना पड़ता था। लेकिन अब ऐसा नही है,आप घर बैठे स्वयं ऑनलाइन अपनी जमीन का खसरा निकाल सकते हैं। इसके लिए आपको नीचे दिए गई प्रक्रिया का पालन करना होगा।






देहरादून (उत्तराखंड)। उत्तराखंड तकनीकि विश्वविद्यालय में एक और अनोखा फर्जीवाड़ा सामाने आया है। जांच समिति की प्राथमिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि विश्वविद्यालय अधिकारियों की जानकारी के बिना ही पीएचडी और बीटेक का परीक्षाफल जारी कर दिया गया। इतना ही नहीं बिना किसी कागजी औपचारिकता के परीक्षाफल भी संशोधित कर दिया गया। इसलिए प्रशासन द्वारा गठित जांच समिति ने इस मामले की जांच विजिलेंस विभाग से कराने की सिफारिश की है।
आपको बता दें कि उत्तराखंड शासन के निर्देश पर गठित जांच समिति ने प्राथमिक जांच में पाया है कि न केवल पीएचडी बल्कि बीटेक की परीक्षाओं में भी बड़ी गड़बड़ी हुई है। जांच में यह बात सामने आयी है कि पीएचडी और बीटेक के परीक्षाफल से संबंधित कागजी दस्तावेज ही नहीं हैं। इसमें न तो कॉपी का मूल्यांकन हुआ और न नंबर ही चढ़ाए गए हैं। इनके परीक्षाफल केवल कंप्यूटर में एक्सल शीट में बनाए गए और परीक्षाफल कंप्यूटर से ही सीधा प्रिंट निकालकर दे दिए गए। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि जो परीक्षाफल विश्वविद्याल ने जारी किया था, उस पर विश्वविद्यालय के किसी भी आधिकारी हस्ताक्षर नहीं था। कुछ छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं का तो दोबारा मूल्यांकन भी करा लिया गया और रिवाइज परीक्षाफल भी जारी कर दिया गया। इस पुर्नमूल्यांकन के लिए किसने आदेश किए, इसका भी कोई प्रमाण विश्वविद्यालय में उपलब्ध नहीं है।
इसके अलावा जांच समिति ने पीएचडी प्रवेश परीक्षा समन्वयक की जिम्मेदारी संभालने वाले अरुण कुमार शर्मा पर भी सवाल खड़े किए हैं। जांच समिति का कहना है कि नियम विरुद्ध पीएचडी प्रवेश परीक्षा की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को दी गई, जो कि खुद वहां से पीएचडी कर रहा है और जो उपनल के माध्यम से भर्ती है। जबकि अरुण कुमार शर्मा का कहना है कि उन्हें न तो ऐसी किसी जांच की जानकारी है और न ही उन्होंने कोई नियम विरुद्ध काम किया है। कुलपति के निर्देश पर उन्होंने केवल ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा का आयोजन कराया था, जिसके पूरे दस्तावेज विश्वविद्यालय में उपलब्ध हैं। उन्होंने जांच समिति को फर्जी करार दिया और कहा कि भविष्य में अगर उनसे सवाल पूछा जाएगा तो वह जवाब देने को तैयार हैं।
हालांकि शासन ने करीब चार माह पूर्व विश्वविद्याल प्रशासन को मामले में कार्रवाई के आदेश जारी किए थे, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं गई। वहीं अब गड़बड़ी का खुलासा होने के बाद विश्वविद्याल की कुलसचिव प्रो. अनीता रावत का कहना है कि मामले में कार्रवाई की जा रही है।
दिल्ली : सभी सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए राहत की खबर है। स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों पर हमला करने वाले मरीज के परिजनों पर तत्काल एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश में कहा गया है कि अस्पताल में तैनात डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टॉफ और नर्सों के साथ किसी भी प्रकार का गलत व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य विभाग के सचिव संजीव खिरवार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अक्सर मारपीट होने पर केस दर्ज करवाने के लिए डॉक्टर हड़ताल पर जाने को मजबूर होते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों व संस्थानों के प्रमुख, विभाग प्रमुख अस्पताल में तीमारदारों द्वारा डॉक्टर व मेडिकल स्टाफ पर होने वाले हमले में तुरंत मामला दर्ज करवाएंगे। इतना ही नहीं भविष्य में ऐसी घटनाओं के बाद मामला दर्ज करवाने के लिए डॉक्टर या मेडिकल स्टाफ पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी बल्कि अस्पताल प्रबंधन या संस्थान प्रमुख ही इसके लिए उत्तरदायी होंगे। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मारपीट होती है तो मामला दर्ज करवाने से लेकर आरोपी को सजा दिलाने तक की जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन की होगी। डॉक्टर इस दिशा में कोई काम नहीं करेंगे।
स्वास्थ्य सचिव के इस एलान के बाद फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, डॉ. सुमेध ने संतोष जाहिर किया । उनका कहना था कि स्वास्थ्य विभाग के इस फैसले से डॉक्टरों को राहत मिली है। अब उन्हें मारपीट या हमला होने पर मामला दर्ज करवाने के लिए हड़ताल नहीं करनी पड़ेगी।
दिल्ली : सभी सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के लिए राहत की खबर है। स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों पर हमला करने वाले मरीज के परिजनों पर तत्काल एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश में कहा गया है कि अस्पताल में तैनात डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टॉफ और नर्सों के साथ किसी भी प्रकार का गलत व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य विभाग के सचिव संजीव खिरवार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि अक्सर मारपीट होने पर केस दर्ज करवाने के लिए डॉक्टर हड़ताल पर जाने को मजबूर होते हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों व संस्थानों के प्रमुख, विभाग प्रमुख अस्पताल में तीमारदारों द्वारा डॉक्टर व मेडिकल स्टाफ पर होने वाले हमले में तुरंत मामला दर्ज करवाएंगे। इतना ही नहीं भविष्य में ऐसी घटनाओं के बाद मामला दर्ज करवाने के लिए डॉक्टर या मेडिकल स्टाफ पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी बल्कि अस्पताल प्रबंधन या संस्थान प्रमुख ही इसके लिए उत्तरदायी होंगे। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मारपीट होती है तो मामला दर्ज करवाने से लेकर आरोपी को सजा दिलाने तक की जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन की होगी। डॉक्टर इस दिशा में कोई काम नहीं करेंगे।
स्वास्थ्य सचिव के इस एलान के बाद फेडरेशन ऑफ रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (फोर्डा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, डॉ. सुमेध ने संतोष जाहिर किया । उनका कहना था कि स्वास्थ्य विभाग के इस फैसले से डॉक्टरों को राहत मिली है। अब उन्हें मारपीट या हमला होने पर मामला दर्ज करवाने के लिए हड़ताल नहीं करनी पड़ेगी।
चंडीगढ़ (हरियाणा) शिक्षक भर्ती घोटाले में तिहाड़ जेल में सजा काट रहे पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को प्रवर्तन निदेशायल ने जोरदार झटका दिया है। प्रवर्तन निदेशालय ने ओम प्रकाश चौटाला की 3 करोड़ 68 लाख की संपत्तियों को जब्त कर लिया है। इन संपत्तियों में ओम प्रकाश चौटाला के नई दिल्ली, पंचकूला और सिरसा में स्थित फ्लैट, प्लॉट और जमीन शामिल हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने यह कार्रवाई आय से अधिक संपत्ति मामले में उनके और अन्य के खिलाफ की है।
आपको बता दें कि ओमप्रकाश चौटाला 2013 से शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में तिहाड़ जेल में 10 साल कैद की सजा काट रहे हैं। चौटाला को प्रीवेंशन ऑफ करप्शन में 7 साल और षड्यंत्र में दोषी पाए जाने पर 10 साल की सज़ा हुई थी। ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अभय चौटाला के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति व मनी लॉन्ड्रिंग का केस लंबित है। यह कार्रवाई आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में मनी लांड्रिंग के तहत दर्ज हुई एफआईआर को लेकर हुई है। उन पर आरोप है कि उन्हेंने 1993 से 2006 के बीच अवैध तरीके से करोड़ों रुपये की संपत्ति बनायी थी।
प्रवर्तन निदेशायल ने कहा है कि, ' ओम प्रकाश चौटाला ने नई दिल्ली, पंचकूला में अचल संपत्तियों का अधिग्रहण किया और अघोषित स्रोतों से प्राप्त धन से हरियाणा के सिरसा में एक आवासीय भवन भी बनाया। उन्होंने 2005 और 2009 में हरियाणा विधानसभा चुनाव में रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष दायर हलफनामे में अर्जित संपत्तियों का भी खुलासा किया था और विवादित संपत्तियों को अविवादित बताया था। अब देखना यह होगा कि चौटाला अदालत के समक्ष क्या सफाई पेश करते हैं।
भोपाल (मध्य प्रदेश)। ई-टेंडर घोटाले में आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने मध्यप्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम के विशेष कार्य अधिकारी नंद कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया है। नंद कुमार को घोटाले का मुख्य सूत्रधार बताया जा रहा है । अब ईओडब्ल्यू ऑस्मो आईटी सॉल्यूशन्स के तीनों संचालकों को सोमवार को अदालत में पेश करने के बाद कुछ दिन और रिमांड पर लेने की कोशिश करेगी ।
आपको बता दें कि बता दें कि मध्य प्रदेश में आर्थिक अपराध शाखा ने राज्य में हजारों करोड़ रुपये के ई-टेंडरिंग घोटाले में एफआईआर दर्ज की थी। इस मामले में ऑस्मो आईटी सॉल्यूशन्स के तीन संचालकों वरुण चतुर्वेदी, सुमित गोलवलकर और विनय चौधरी से पूछताछ में ईओडब्ल्यू को घोटाले के मुख्य सूत्रधार तक पहुंचने के सुराग मिले। पूछताछ में यह बात सामने आयी है कि मध्यप्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम के ई-प्रिक्योरमेंट के ओएसडी नंद कुमार ही मुख्य सूत्रधार है। वह बिजली कंपनी के अधीक्षण यंत्री हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम में प्रतिनियुक्ति पर हैं। जांच में सामने आया है कि डेमो के माध्यम से ही गड़बड़ी की शुरुआत हुई थी। ऑस्मो आईटी सॉल्यूशन्स के संचालकों से पूछताछ में ई-टेंडर की गोपनीयता को भंग करने के लिए बड़ी राशि के लेनदेन के तथ्य भी सामने आए हैं। करीब एक दर्जन नेताओं और नौकरशाहों के नाम भी सामने आए हैं, जिनके टेंडर में गड़बड़ी घोटाले में शामिल होने की बात सामने आई है। अब जल्दी ही नेताओं और नौकरशाहों पर कार्रवाई हो सकती है।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट में कई पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक, करीब छह आइएएस अधिकारी व अन्य अफसर दोषी पाए गए हैं। लोकायुक्त न्यायमूर्ति संजय मिश्रा ने शुक्रवार को राजभवन में राज्यपाल राम नाईक से मुलाकात कर उन्हें लोकायुक्त प्रशासन का वार्षिक प्रतिवेदन-2018 सौंपा। हालांकि लोकायुक्त प्रशासन ने आरोपियों के नामों का खुलासा नहीं किया है ।
लोकायुक्त प्रशासन के सचिव पंकज कुमार उपाध्याय ने पत्रकारों से बातचीत में वार्षिक प्रतिवेदन के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त की ओर से वर्ष 2018 में कुल 22 प्रतिवेदन एवं 6 संस्तुतियां सक्षम प्राधिकारी को भेजी गई। इसके अलावा कुल 6 विशेष प्रतिवेदन राज्यपाल को भेजे गए। इनमें पिछली सरकारों के कुछ मंत्री और नौकरशाह दोषी पाए गए हैं। सबसे अधिक मामले ग्राम विकास व ग्राम पंचायत विभाग से जुड़े हैं, जो कुल शिकायतों के करीब 25 फीसद हैं। इनमें वीडीओ, बीडीओ, एडीओ समेत अन्य अधिकारी दोषी पाये गए हैं, जिनके खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई है।
सचिव पंकज कुमार उपाध्याय ने बताया कि वर्ष 2018 में लोकायुक्त प्रशासन को कुल 3915 परिवाद प्राप्त हुए, जबकि 882 परिवाद पूर्व से लंबित थे। इस तरह कुल 4797 परिवादों पर कार्रवाई की गई। वर्ष 2018 में प्रारंभिक जांच के आधार पर 3169 परिवाद निस्तारित किये गए। इनमें 395 ऐसे परिवाद हैं, जिनका निस्तारण विवेचना के बाद किया गया। लोकायुक्त न्यायमूर्ति संजय मिश्रा व उप लोकायुक्त शंभू सिंह यादव ने 22 प्रतिवेदन व छह संस्तुतियां सक्षम प्राधिकारी को भेजी हैं। इनमें कई पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई है। जो छह संस्तुतियां की गई हैं, उनमें अधिकारियों पर लगाये गए आरोपों के साक्ष्य प्रारंभिक जांच में ही मिल गए थे। इसके साथ ही छह विशेष प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपे गए हैं। लोकायुक्त प्रशासन ने पद के दुरुपयोग, पद के कर्तव्यों का निर्वाहन न करने व सेवानिवृत्ति के भुगतान संबंधी मामलों में प्रभावी कार्रवाई करते हुए 650.65 लाख रुपये का भुगतान कराया। इनमें 90 फीसद मामले सेवानिवृत्ति से संबंधित हैं। अधिकारियों ने बताया कि सबसे अधिक भुगतान चीनी मिल के सेवानिवृत्त कर्मचारियों के कराये गए।
उन्होंने बताया कि लोकायुक्त संगठन के अधिकार, कार्यप्रणाली और परिवाद दायर करने के संबंध में आम जनता को जागरूक करने के लिए प्रदेश के विभिन्न जिलों में शिविर आयोजित किए गए। इसके अलावा विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे 540 छात्र-छात्राओं को ग्रीष्मकालीन-शीतकालीन अवकाशों में व्यवहारिक प्रशिक्षण कराया गया।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)। यदि आप नगर निगम की लापरवाही के चलते घर के आस-पास फैली गंदगी से परेशान है तो लखनऊ जिला उपभोक्ता फोरम का एतिहासिक फैसला आपके लिए राहत की खबर है। फोरम के न्यायिक अधिकारी राजर्षि शुक्ला ने नगर निगम को लापरवाही के लिए दोषी ठहराते हुए नगर आयुक्त का एक वर्ष का वेतन काटने का आदेश दिया।और साथ ही 15 दिनों में इन समस्याओं से निजात दिलाने का आदेश भी पारित किया है।
आपको बता दें कि लखनऊ शहर निवासी डॉ. आनंद अखिला ने कॉलोनी के आसपास फैली गंदगी से परेशान होकर साफ-सफाई के लिए कई बार नगर निगम के चक्कर लगाए, लेकिन नगर निगम अधिकारियों ने उनकी सुनवाई नहीं की। इससे परेशान होकर उन्होंने मई, 2017 में जिला उपभोक्ता फोरम प्रथम लखनऊ के सामने (वाद संख्या-197/17) शिकायत की थी । इसमें उन्होंने कहा था कि वह नगर निगम को नियमित रूप से हाउस टैक्स और वॉटर टैक्स देते हैं और यह उनका अधिकार बनता है कि नगम निगम उन्हें एक उपयुक्त और स्वच्छ वातावरण मुहैया कराए। डॉ. आनंद अखिला ने साक्ष्यों के माध्यम से शहर की बदहाल स्थिति कोर्ट के सामने रखी, जिन पर गौर करने के बाद बेंच ने नगर निगम के जवाबों को नकार दिया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद फोरम के न्यायिक सदस्य राजर्षि शुक्ला और अध्यक्ष अरविंद कुमार ने शुक्रवार को ऐतिहासिक फैसला देते हुए आदेश दिया कि शिकायकर्ता डॉ. अखिला को नगर आयुक्त डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी का एक वर्ष का वेतन काटकर दिया जाए। इसके अलावा आदेश में कहा गया है कि 15 दिन के भीतर, जहां डॉ. अखिला रहते हैं, उसके आसपास सफाई व्यवस्था दुरुस्त की जाए। कोर्ट ने कहा कि यदि 15 दिन में अनुपालन न किया गया तो डॉ. अखिला उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 के तहत कानूनी प्रक्रिया के लिए अधिकृत होंगे। नगर निगम के काम से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति साफ-सफाई, खुले मेनहोल अथवा आवारा पशुओं की समस्या आदि के लिए उपभोक्ता अदालत में वाद दाखिल कर सकेगा।
खसरा और खतौनी की मुख्य उद्देश्य लोगों को उनकी जमीन के बारे में जानकारी देना है। आप अपनी जमीन से संबंधित खसरा, खतौनी दो तरीके से प्राप्त कर सकते हैं।
खतौनी प्राप्त करने की प्रक्रिया अब बहुत आसान हो चुकी है। इंटरनेट पर ही अब ये सारी जानकारियां मौजूद हैं। आप इस तरह से अपना समय और पैसा बचा सकते हैं, इसके लिए नीचे बताए चरण का अनुसरण करें।








भोपाल (मध्य प्रदेश)। लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए होने वाले मतदान से पहले आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने शिवराज सरकार के दौरान ई-टेंडरिंग घोटाले में एफआईआर दर्ज की है। इसमें सात कंपनियों, मध्य प्रदेश सरकार के पांच अलग-अलग विभागों के अफसरों और अज्ञात नेताओं के नाम शामिल हैं। जल्द ही आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट पेश की जाएगी। और उनके खिलाफ भी जांच की जाएगी।
इकोनॉमिक ऑफेंस विंग के डीजी के.एन. तिवारी ने बताया कि राज्य सरकार के 5 विभागों के 9 टेंडरों के सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़ करके कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाया गया। इन 5 विभागों में मध्य प्रदेश जल निगम, पीडब्ल्यूडी, जल संसाधन विभाग, मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम और पीडब्ल्यूडी का पीआईयू विभाग शामिल हैं। इकोनॉमिक ऑफेंस विंग के डीजी के मुताबिक करीब 3 हज़ार करोड़ के ई-टेंडरिंग घोटाले में नई दिल्ली के कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई है। कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम ने अपनी जांच में भी ये पाया था कि हैकर्स सरकार के ई-प्रॉक्योरमेंट सॉफ्टवेयर में सेंध लगाने में कामयाब हो गए थे। पिछले महीने ही जांच एजेंसी ने ईओडब्ल्यू को जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसमें ये बताया था कि ई-टेंडर में बदलाव किए गए थे और कई लोगों ने अनाधिकृत रुप से सॉफ्टवेयर के साथ छेड़छाड़ की थी। इसके लिए एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में उन कम्प्यूटर सिस्टम के आईपी नंबर भी बताए हैं, जिसके जरिए जल निगम के तीन टेंडरों को हैक किया गया था और फिर छेड़छाड़ करके मनपसंद कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। इसके बाद जांच एजेंसी ने ईओडब्ल्यू से 6 दूसरे टेंडरों के लॉग मांगे थे। ताकि जांच की जा सके।
बताया जा रहा है कि पीएचई, पीडब्ल्यूडी और जल संसाधन विभाग में तीन हजार करोड़ के ई-टेंडर में छेड़छाड़ के मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद संबंधित विभाग में पदस्थ रहे प्रमुख सचिव से लेकर तत्कालीन मंत्रियों से भी पूछताछ हो सकती है।
खसरा क्या होता है
खतौनी क्या होता है
शजरा (जमीन का नक्शा) क्या है
खसरा, खतौनी और नक्शे का उपयोग क्या है
चतरा (झारखंड)। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद रिश्वतखोर सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी रुकने का नाम नहीं ले रही है। ताजा मामाला चतरा जिले के हंटरगंज का है। जहां एंटी करप्शन ब्यूरो ने मंगलवार को एक विवादित जमीन को प्रतिवेदन देने के नाम पर दस हजार रुपए रिश्वत लेते हुए राजस्व कर्मचारी को रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया। और आरोपी राजस्व कर्मचारी फेड्युस मिंज को हजारीबाग ले गए और आगे की कानूनी कार्यवाही शुरु कर दी।
आपको बता दें कि, चतरा जिले के हंटरगंज अंचल क्षेत्र के डाहा पंचायत के बेला गांव निवासी राम स्वरूप यादव की पत्नी मुनिया देवी और दिनेश यादव, सीताराम यादव, लखन यादव के बीच काफी दिनों से जमीन विवाद चल रहा है। मुनिया देवी ने इस विवादित जमीन को लेकर स्थानीय अंचल कार्यालय में पदस्थापित हल्का नंबर सात के राजस्व कर्मचारी फेड्युस मिंज से अपने पक्ष में प्रतिवेदन देने की बात कही थी। इस बातचीत के दौरान राजस्व कर्मचारी मिंज ने मुनिया देवी से कहा था कि वह प्रतिवेदन के एवज में दस हजार रुपये बतौर रिश्वत दे दे तो उसका काम हो जाएगा। और जब मुनिया देवी ने फेड्युस मिंज को रिश्वत नहीं दी तो वह प्रतिवेदन देने से टाल मटोल करते हुए उसे परेशान करने लगे। फेड्यूज मिंज की इस हरकत से परेशान महिला ने अपने करीबी रामजीत यादव की मदद से एसीबी की टीम से संपर्क किया। वहीं मामले की शिकायत मिलने के बाद मंगलवार को एसीबी टीम ने जाल बिछाकर दस हजार रुपए रिश्वत लेते हुए राजस्व कर्मचारी फेड्युस मिंज को रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया। गौरतलब है कि फेड्युस मिंज 30 अप्रैल को राजस्व कर्मचारी से सेवा निवृत हो रहे थे।
भोपाल (मध्य प्रदेश)। दिल्ली आयकर निदेशालय की छापेमारी में मुख्यमंत्री कमलनाथ के ओएसडी प्रवीण कक्कड़ के ठिकानों से लगभग 281 करोड़ रुपये की बेहिसाब नकदी का खुलासा हुआ है। यह नकदी व्यवसाय, राजनीति और सार्वजनिक सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों के कई व्यक्तियों के माध्यम से इकट्ठा की गयी है। हालांकि अभी भी ओएसडी प्रवीण कक्कड़ के घर पर आयकर विभाग की कार्रवाई जारी है।
बताया जा रहा है कि नकदी का एक हिस्सा दिल्ली के एक प्रमुख राजनीतिक दल के मुख्यालय को भी हस्तांतरित किया गया, जिसमें लगभग 20 करोड़ रुपये शामिल थे। यह पैसा राजनीतिक पार्टी के मुख्यालय में एक वरिष्ठ अधिकारी के तुगलक रोड, नई दिल्ली स्थित आवास पर स्थानांतरित किया गया था। इस कार्रवाई में 14.6 करोड़ रुपये का बेहिसाब कैश, 252 शराब की बोतलें, हथियार और बाघ की खालें भी बरामद की गई हैं।
वरिष्ठ पदाधिकारी के करीबी रिश्तेदार के समूह में दिल्ली में तलाशी के कारण नकद साक्ष्य रिकॉर्डिंग सहित साक्ष्य जब्त किए गए, जिसमें 230 करोड़ रुपये का बेहिसाब लेनदेन दर्ज किया गया। इसके अलावा 242 करोड़ रुपये की रकम के फर्जी बिलों के जरिए हेरफेर और टैक्स के लिए स्वर्ग कहे जाने वाले देशों में 80 कंपनियों के भी साक्ष्य मिले हैं।
चंडीगढ़ (हरियाणा) । देशभर में भ्रष्टाचार को खत्म करने का हथियार बने आधार को ही भ्रष्टाचारियों ने सोनीपत में पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना में घोटाले का जरिया बना लिया। और अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों के लिए शुरू की गई पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के साढ़े तीन करोड़ रुपये पर हाथ साफ कर दिया । यह कारनामा अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग कल्याण विभाग के कर्मचारियों ने छात्र-छात्राओं के आधार नंबर बदलकर अंजाम दिया। हालांकि घोटाले की प्राथमिक जांच के बाद विभाग के महानिदेशक संजीव वर्मा ने पांच कर्मचारियों को निलंबित करने के आदेश जारी कर दिया है और दो अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है।
आपको बता दें कि सोनीपत जिला कार्यालय की ओर से 352 छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति देने के लिए 236 करोड़ रुपये के प्रस्ताव स्वीकृति हुए थे । इस राशि की स्वीकृति के बाद ईपीएस बैंक ने महानिदेशक कार्यालय को सूचित किया कि स्वीकृत राशि को खातों में ट्रांसफर करने के लिए अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग कल्याण विभाग के कर्माचारियों ने दूसरे आधार नंबर जोड़ते हुए गड़बड़ी की है। इसकी सूचना मिलने पर विभाग के महानिदेशक संजीव वर्मा ने राज्य मंत्री कृष्ण कुमार बेदी से मंजूरी लेने के बाद चार सदस्यीय जांच कमेटी गठित की। इस कमेटी में शामिल अमिता गोयल, सतनाम खांबरा, मोहित दत्ता और रीतू गुप्ता ने रिपोर्ट दी कि 352 मामलों में सिर्फ सात केस सही हैं, जबकि दो के नाम बदले हुए हैं, लेकिन उनके आधार नंबर ठीक हैं। बाकी सभी मामले में गड़बड़ी हुई है। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर ही पांच कर्मचारियों अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग कल्याण विभाग के डाटा एंट्री आपरेटर मुख्यालय कुलजीत सिंह, हेड आफिस के लिपिक संजीव कुमार, सहायक रामधारी, सहायक बिलेंद्र सिंह और अकाउंटेंट कम क्लर्क सुरेंद्र कुमार को निलंबित करने के आदेश जारी किए गए हैं। जबकि उप निदेशक कम डीडीओ अनिल कुमार और उप निदेशक (ट्रेनिंग) आरएस सांगवान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की गयी है।
अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग कल्याण विभाग के महानिदेशक को आशंका है कि आधार नंबर बदलकर छात्रवृत्ति में घोटाले का खेल लंबे समय से खेला जा रहा है। इसमें कई बड़े खिलाड़ी शामिल होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। उन्होंने सरकार को भेजी अपनी रिपोर्ट में हरियाणा के प्रधान महालेखाकार (लेखा परीक्षा) से पिछले तीन साल में जारी हुई राशि का स्पेशल आडिट कराने का सुझाव दिया है। पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना में घोटाले के तार कई सफेदपोशों से जुड़े होने की आशंका के चलते स्टेट विजिलेंस ब्यूरो से भी जांच कराने की सिफारिश की गई है।