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आप सबसे पहले झूठी शिकायत देने वाले शिकायतकर्ता के खिलाफ एक काउंटर शिकायत सम्बंधित या नजदीकी पुलिस स्टेशन में दें या उनके उच्चाधिकारी को दें। शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी सबूत को साथ देने की जरूरत नहीं होती है। यह जांच अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वो शिकायत की जांच करे, गलत पाये जाने पर शिकायत बंद कर दे या फिर सही पाये जाने पर सम्बंधित धारा के तहत केस दर्ज करें।
पुलिस किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज करने के बाद, उसकी जांच करती है। जब जांच के दौरान पुलिस को लगता है कि मामले में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं तो वह उस केस में मुकदमा चलाने के लिए न्यायालय में आरोप पत्र या चार्जशीट पेश करती है। इसे पुलिस चालान भी कहा जाता है।
जयपुर (राजस्थान)। देश में आए दिन सामने आ रहे मॉब लिंचिग के मामले पर अशोक गहलोत सरकार ने सख्त कदम उठाया है। सरकार ने मॉब लिंचिंग (भीड़ हत्या) पर एक कठोर कानून बनाया है। राजस्थान में अब मॉब लिंचिंग की घटना में पीड़ित की मौत पर दोषियों को आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये तक का जुर्माने की सजा भुगतनी पड़ेगी।
अशोक गहलोत सरकार ने सोमवार को विधानसभा में "राजस्थान लिंचिंग संरक्षण विधेयक-2019" में पेश किया जो पारित हो गया। भाजपा ने इस विधेयक का विरोध किया। विधेयक में मॉब लिंचिंग को गैर जमानती,संज्ञेय अपराध बनाया गया है। अब मॉब लिंचिंग की घटना में पीड़ित की मौत पर दोषियों को आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये तक का जुर्माने की सजा भुगतनी पड़ेगी। वहीं, मॉब लिंचिंग में पीड़ित के गंभीर रूप से घायल होने पर 10 साल तक की सजा और 50 हजार से तीन लाख रुपये तक का जुर्माना दोषियों को भुगतना पड़ेगा। मॉब लिंचिंग में किसी भी रूप से सहायता करने वाले को भी वही सजा मिलेगी, जो लिंचिंग करने वाले को मिलेगी। जबकि मारपीट करने पर 7 साल के कठोर कारावास व एक लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान है। लिंचिंग की घटना के वीडियो, फोटो किसी भी रूप में प्रकाशित या प्रसारित करने पर भी एक से तीन साल तक की सजा और 50 हजार रुपये का जुर्माना देय होगा। विधेयक में प्रावधान किया गया है कि दो व्यक्ति भी अगर किसी को मिलकर पीटते हैं तो उसे मॉब लिंचिंग माना जाएगा । विधेयक में धर्म, जाति, भाषा, राजनीतिक विचारधारा, समुदाय और जन्म स्थान के नाम पर भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा को मॉब लिंचिंग माना है।
मॉब लिंचिंग के जुड़े मामले की जांच इंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी करेगा। इस तरह के मामलों की पुलिस महानरीक्षिक रैंक व जिलों में उप अधीक्षक रैंक का अधिकारी मॉनिटरिंग करेगा। इस तरह के मामलों की तुरंत सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर विशेष न्यायाधीश नियुक्त कर सकेंगे। सेशन स्तर के न्यायाधीश ही ऐसे मामलों की सुनवाई कर सकेंगे। विधेयक में प्रावधान किया है कि पीड़ित को राजस्थान विक्टिम कंपसेशन स्कीम के तहत सहायता दी जाएगी और दोषियों से जो जुर्माना वसूला जाएगा उसे पीड़ित को दिया जाएगा।
यदि आप परिमंडल के मुख्य प्रधान डाकपाल से की गयी कार्रवाई से भी असंतुष्ट है, तो आप शिकायत की प्रकृति के अनुसार डाक निदेशालय, डाक भवन, नई दिल्ली में निम्नलिखित अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं :
डाक निदेशालय, डाक भवन, नई दिल्ली
1- स्पीड पोस्ट, एक्सप्रेस पोस्ट, बिज़नेस पार्सल, रसद पोस्ट की देरी से सुपुर्दगी / सुपुर्दगी न होने की शिकायत, सी ओ डी राशि का भुगतान न होने और प्रीमियम उत्पादों से सम्बंधित अन्य शिकायतें:
अधिकारी का पदनाम और पता-
i) जन शिकायत (पी जी) प्रभाग, डाक निदेशालय, नई दिल्ली 110001.
ii)उप-महा प्रबंधक (बी पी) ई पी पी, एल पी, बी पी के लिए
iii) ए डी जी (आइ एम) अंतरराष्ट्रीय डाक के लिए
iv) डी डी जी (पी जी) पंजीकृत पत्र/ पार्सल के लिए
दूरभाष-
i) उप-महा प्रबंधक (एस पी)-011-23096075
ii) उप महाप्रबंधक (बी पी)-011-23096075
iii) ए डी जी (आई एम)-011-23096112
iv) डी डी जी (पी जी)-011-23096087
2- बचत बैंक या बचत प्रमाण पत्र या उससे संबद्ध दावों से संबंधित शिकायतें:
अधिकारी का पदनाम और पता-
उप-महानिदेशक (एफ एस), डाक भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली 110001.
ईमेल, दूरभाष संख्या एवं फैक्स संख्या-
This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. और This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. 011-23096101 (दूरभाष), 011-23096101 (फैक्स)
3- सामान्य डाक की सुपुर्दगी न होने, देरी से होने या गलत सुपुर्दगी होने, मनी ऑर्डर या इलेक्ट्रॉनिक मनी ऑर्डर का भुगतान न होने या देरी से होने, पंजीकृत वस्तुओं का वितरण ना होने, देरी से होने या पावती न मिलने, बीमाकृत वस्तुओं, पार्सल, पैकेट की सुपुर्दगी न होने या देरी से होने की शिकायतें, क्रमांक 1 ibid में निर्दिष्ट वस्तुओं को छोड़कर डाक वस्तुओं में एक तरह की वस्तुओं के पृथक्करण संबंधी शिकायतें| डाकघर के कर्मचारियों द्वारा दुर्व्यवहार की शिकायतें, या क्रम संख्या 1, 2, 3, 4 और 5 के अंतर्गत नहीं आने वाले विविध श्रेणी से जुड़ी शिकायतें:
अधिकारी का पदनाम और पता-
उप महानिदेशक (पी जी और क्यू ए), डाक भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली 110001.
ईमेल, दूरभाष संख्या एवं फैक्स संख्या-
This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. 011-23096087 (दूरभाष), 23353883 (फैक्स)
4- डाक जीवन बीमा या ग्रामीण डाक जीवन बीमा सबंधी शिकायतें:
अधिकारी का पदनाम और पता-
मुख्य महाप्रबंधक (पी एल आई), पी एल आई निदेशालय, चाणक्य पुरी, नई दिल्ली 110021
ईमेल, दूरभाष संख्या एवं फैक्स संख्या-
This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it. 011-24672461 (दूरभाष), 26882838 (फैक्स)
5- डाक कर्मचारियों के पेंशन मामले और ग्रामीण डाक सेवकों से सम्बंधित मामले की शिकायतें:
अधिकारी का पदनाम और पता-
उप महानिदेशक (स्थापना), डाक भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली110001
ईमेल, दूरभाष संख्या एवं फैक्स संख्या-
011-23096098 (दूरभाष), 23096007 (फैक्स)
कोरबा (छत्तीसगढ़) । पुलिस का एक और हैरान कर देने वाला अनोखा कारनामा सामने आया है। कोरबा के मस्तूरी क्षेत्र में एक युवक ने पुलिस द्वारा डीजल चोरी के आरोप में धमकाने पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस इतने पर ही नहीं रुकी उसने मृतक के खिलाफ चोरी का केस भी दर्ज कर लिया। पुलिस के इस कारनामे से नाराज परिजनों ने मस्तूरी थाना अध्यक्ष से मिलकर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज कर कार्रवाई करने की मांग की।
बताया जा रहा है कि कोरबा जिले के मस्तूरी क्षेत्र के ग्राम पेंड्री निवासी राकेश भास्कर का पुत्र आकाश भास्कर मंगलवार को कोरबा के पथर्रीपारा में रहने वाले अपने चाचा के घर घूमने गया था। इस दौरान मस्तूरी थाने के एएसआइ यदु आकाश की तलाश में पेंड्री स्थित उसके घर पहुंच गए। उन्होंने परिजन को बताया कि वह डीजल चोरी करने का आरोपित है। लिहाजा, उससे पूछताछ करनी है। एएसआई को परिजनों ने बताया कि आकाश अपने चाचा के यहां कोरबा गया हुआ है। इस पर एएसआई ने मोबाइल पर बात कराने के लिए कहा। परिजनों का आरोप है कि मोबाइल पर ही आकाश को एएसआई ने डीजल चोरी करने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई करने की धमकी दी। इसकी वजह से आकाश बेहद घबरा गया और रात में ही चाचा के घर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। रामपुर पुलिस ने केस दर्ज कर शव को पोस्टमार्टम कराने के बाद परिजनों को सौंप दिया है। रामपुर पुलिस का कहना है कि आकाश के आत्महत्या करने की वजह की जांच अभी की जा रही है।
वहीं नाराज परिजन मस्तूरी थाना पहुंच गए और आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने इस मामले के दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। इधर, युवक की आत्महत्या का मामला तूल पकड़ते देखकर मस्तूरी पुलिस ने लीपापोती शुरू कर दी है। पुलिस ने दर्रीघाट निवासी हाइवा संचालक दिलीप कुमार लोनिया की शिकायत पर गुरुवार को आकाश के खिलाफ चोरी का अपराध दर्ज कर लिया है। और कानूनी कार्यवाही शुरु कर दी।
अयोध्या (उत्तर प्रदेश)। देश में लेखपालों की बेइमानी जगजाहिर है। ताजा मामला अयोध्या के बीकापुर तहसील का है, जहां के लेखपाल ने एक गरीब विधवा को आय प्रमाण पत्र में करीब पांच करोड़ की मालकिन बना दिया। महिला के पुत्र ने छात्रवृत्ति के लिए आय प्रमाण पत्र बनवाने का आवेदन किया था। अब महिला न्याय के लिए दर-दर भटक रही है, लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। हालांकि एसडीएम बीकापुर ने कार्यवाही का भरोसा दिया है।
आपको बता दें कि गरीब विधवा तारादेवी अयोध्या जिले की बीकापुर तहसील के मानापुर क्षेत्र की रहने वाली हैं। उसके पुत्र अमित कुमार गुप्ता ने छात्रवृत्ति का आवेदन पत्र भरने के लिए लेखपाल के पास आय प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था। छात्र की मां तारादेवी का आरोप है कि जब वह आवेदन पर रिपोर्ट लगाने के लिए लेखपाल धीरेंद्र प्रताप यादव से मिली तो उन्होंने उससे रिश्वत की मांग की। धीरेंद्र प्रताप यादव ने रिश्वत नहीं मिलने पर छात्रवृत्ति आवेदन की अंतिम तारीख 30 जुलाई को आय प्रमाणपत्र जारी तो कर दिया, लेकिन उसकी वार्षिक आय पांच करोड़ 20 लाख पांच हजार दो सौ रुपये लिख दी। जिसकी वजह से उनका पुत्र छात्रवृति प्राप्त करने से वंचित हो गया। जबकि सच्चाई यह है कि तारादेवी खेती-बारी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं।
तारादेवी की जब कहीं सुनवाई नही हुई तो उन्होंने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज करायी। हालांकि मामला उजागर होने के बाद से तहसील प्रशासन में हड़कंप मच गया, लेकिन फिर भी अभी तक लेखपाल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है। हालांकि इस मामले पर एसडीएम बीकापुर लवकुमार सिंह का कहना है कि मामला उनके संज्ञान में आया है। वह तहसीलदार से इस मामले की पड़ताल करावाएंगे। अब देखना है कि भ्रष्ट लेखपाल के खिलाफ कोई कार्रवाई होती है या फिर कुछ दिन बाद मामले की लीपापोती कर दी जाती है।
अयोध्या (उत्तर प्रदेश)। देश में लेखपालों की बेइमानी जगजाहिर है। ताजा मामला अयोध्या के बीकापुर तहसील का है, जहां के लेखपाल ने एक गरीब विधवा को आय प्रमाण पत्र में करीब पांच करोड़ की मालकिन बना दिया। महिला के पुत्र ने छात्रवृत्ति के लिए आय प्रमाण पत्र बनवाने का आवेदन किया था। अब महिला न्याय के लिए दर-दर भटक रही है, लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। हालांकि एसडीएम बीकापुर ने कार्यवाही का भरोसा दिया है।
आपको बता दें कि गरीब विधवा तारादेवी अयोध्या जिले की बीकापुर तहसील के मानापुर क्षेत्र की रहने वाली हैं। उसके पुत्र अमित कुमार गुप्ता ने छात्रवृत्ति का आवेदन पत्र भरने के लिए लेखपाल के पास आय प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था। छात्र की मां तारादेवी का आरोप है कि जब वह आवेदन पर रिपोर्ट लगाने के लिए लेखपाल धीरेंद्र प्रताप यादव से मिली तो उन्होंने उससे रिश्वत की मांग की। धीरेंद्र प्रताप यादव ने रिश्वत नहीं मिलने पर छात्रवृत्ति आवेदन की अंतिम तारीख 30 जुलाई को आय प्रमाणपत्र जारी तो कर दिया, लेकिन उसकी वार्षिक आय पांच करोड़ 20 लाख पांच हजार दो सौ रुपये लिख दी। जिसकी वजह से उनका पुत्र छात्रवृति प्राप्त करने से वंचित हो गया। जबकि सच्चाई यह है कि तारादेवी खेती-बारी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं।
तारादेवी की जब कहीं सुनवाई नही हुई तो उन्होंने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज करायी। हालांकि मामला उजागर होने के बाद से तहसील प्रशासन में हड़कंप मच गया, लेकिन फिर भी अभी तक लेखपाल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है। हालांकि इस मामले पर एसडीएम बीकापुर लवकुमार सिंह का कहना है कि मामला उनके संज्ञान में आया है। वह तहसीलदार से इस मामले की पड़ताल करावाएंगे। अब देखना है कि भ्रष्ट लेखपाल के खिलाफ कोई कार्रवाई होती है या फिर कुछ दिन बाद मामले की लीपापोती कर दी जाती है।
डाक विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवाओं से आप संतुष्ट नहीं हैं तो विभाग के सम्बंधित अधिकारी को शिकायत कर सकते हैं और दिए गए ईमेल, दूरभाष संख्या या फैक्स पर भेज सकते हैं।
सीवान (बिहार)। बिहार के सीवान जेल के पुलिस अधिकारियों ने लापरवाही की हद ही कर दी। यहां की न्यायालय ने जिस कैदी को जमानत दी थी, जेल प्रशासन ने उस कैदी के हम नाम वाले दूसरे कैदी को जमानत के आधार पर छोड़ दिया। जब जेल में बंद कैदी ने अपनी रिहाई की सूचना पुलिस को दी तब मामले का खुलासा हुआ। इस गलती का पता चलते ही जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। इसके बाद आनन-फानन में छोड़े गए कैदी को गिरफ्तार करने के लिए छापेमारी शुरु कर दी।
बताया जा रहा है कि बिहार की सीवान जेल में गुल मोहम्मद नाम के दो कैदी सजा काट रहे त थे। सीजेएम न्यायालय ने इनमें से एक कैदी की जमानत मंजूर कर ली थी। रिलीज ऑर्डर जारी होने के बाद जेल प्रबंधन ने गुल मोहम्मद नाम के दूसरे कैदी को जमानत पर रिहा कर दिया। जिस कैदी को जमानत पर रिहा कर दिया गया वो डकैती कांड में गिरफ्तार हुआ पेशेवर अपराधी है। जेल से बाहर आने के बाद से ही वह फरार चल रहा है। वहीं न्यायालय ने जिस गुल मोहम्मद की जमानत मंजूर की थी वह सहसरांव गांव का रहने वाला है। गुल मोहम्मद ने जब जमानत पर अपनी रिहाई की सूचना जेल अधिकारियों को दी, तब इस मामले का खुलासा हुआ। वहीं इस घटना के बाद जेल में बंद गुल मोहम्मद के वकील एमए खान ने कहा "ये लिपीकीय गलती है। ये कोई इरादतन की गई गलती नहीं है। हम इसे 'स्लिप ऑफ पेन' कह सकते हैं।" जबकि जेल प्रशासन का कहना है कि, "पेशकार की गलती से रिलीज ऑर्डर जेल को भेज दिया गया था।" हालांकि पुलिस जेल से छोड़े गए कैदी गुल मोहम्मद को गिरफ्तार करने के लिए छापेमारी कर रही है।
डाक कर्मचारियों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे ग्राहकों से विनम्रता से पेश आएं और उनकी जरूरतों को समझें। काम के घंटों में पोस्टमास्टर को अपने ऑफिस में मौजूद होना आवश्यक है।
डाक विभाग ने ग्राहकों की शिकायतों के समाधान के लिए पोस्ट हेल्प सेंटर बनाया है। डाकघर से संबंधित सेवाओं लेकर कोई भी शिकायत है तो आप देर न करें और इसकी शिकायत तत्काल 1924 नंबर पर दर्ज कराएं।
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)। डिजिटल इंडिया की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। धर्मशाला के विकास कार्यों में भ्रष्टाचार को रोकने और पारदर्शिता लाने के लिए ई विधानसभा प्रबंधन एप के तहत ऑनलाइन विधायकों सहित सभी विभागाध्यक्षों को जोड़ा गया है। अब जिले के विधायक इस एप के जरिए अपने विधानसभा क्षेत्र के सभी विकास कार्यों की जानकारी ऑनलाइन ले सकेंगे। और अधूरी पड़ी परियोजनाओं के लिए धन की उपलब्धता और कार्य में प्रगति लाने के लिए प्रयास भी कर सकेंगे।
धर्मशाला के तपोवन में स्थित विधानसभा परिसर में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने 15 विधानसभा क्षेत्रों के विधायकों और अधिकारियों के लिए ई-विधान प्रबन्धन कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में विधायकों को विकास कार्य की ऑनलाइन जानकारी देने के लिए एक प्रशिक्षण भी दिलवाया गया। इस एप की प्रक्रिया से जिले के सभी विभाग अध्यक्षों को अवगत भी करवाया गया। ऑनलाइन इस प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए सभी विभागों के मुखियाओं को यूजर आईडी व पासवर्ड भी जारी किया गया है। इस सुविधा के चलते विकास कार्यों की जानकारी देने से अब वह अधिकारी नपेंगे, जो कार्य को लेकर कोताही बरतते हैं। अधिकारी विकास कार्य को लेकर अब तक हुई प्रगति या रुकावट या फिर कार्य के पूरा न होने के बारे में लिखित जवाब अपने क्षेत्र के विधायक को देंगे।
डॉ. बिन्दल ने कहा कि ई-विधान प्रबंधन प्रणाली के लागू होने से कार्य में दक्षता और पारदर्शिता आएगी। ई-विधान प्रबंधन कार्यशाला का उद्देश्य विधायकों, जनता, सरकार और अधिकारियों में परस्पर संपर्क कायम करना है। उन्होंने कहा कि मोबाइल एप के माध्यम से विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में चल रहे विकास कार्यों की जानकारी ले सकेंगे, अधूरी पड़ी परियोजनाओं के लिए धन की उपलब्धता और कार्य में प्रगति लाने के लिए प्रयास करने में सक्षम होंगे।
नई दिल्ली। देश का नागरिक जब किसी मामले में पीड़ित होता है तो वह न्याय की आस में न्यायालय की शरण लेता है कि उसे न्याय मिलेगा। लेकिन दिल्ली की एक अदालत ने एक बुजर्ग पिता के इस भरोसे को तोड़ दिया। और वह 19 वर्ष से न्याय पाने की आस में न्यायालय का चक्कर लगा रहे हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने बुजुर्ग नवल किशोर पर दया दिखाते हुए, उनकी चिट्ठी को जनहित याचिका में बदल दिया है और इसकी सूचना नवल किशोर को एसएमएस के जरिए दे दी है। हालांकि अभी तक मामले की सुनवाई नहीं हुई है।
बुजुर्ग नवल किशोर का कहना है कि उनका 17 साल का बेटा बिजेन्द्र अक्टूबर 2000 में दिल्ली की आजादपुर मंडी से ट्रक में शकरकंद लाद कर उत्तर प्रदेश में शामली जा रहा था। इस दौरान कैराना के पास कुछ बदमाशों ने रास्ते में ट्रक रुकवाने की कोशिश की। जब ड्राइवर ने ट्रक को नहीं रोका तो बदमाशों ने ट्रक पर गोली चला दी। यह गोली बिजेन्दर के गले में लग गयी और उसकी मौत हो गई। जब इस घटना की जानकारी नवल किशोर को मिली तो उन्होंने मुजफ्फर नगर की न्यायालय में जाकर इस घटना की एक लिखित शिकायत दी। जब कुछ समय बाद नवल किशोर को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं नजर आयी। तो उन्होंने न्याय मिलने की आशंका जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय से मुकदमा दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने 7 फरवरी 2011 को कैराना मुजफ्फरनगर के न्यायालय से मुकदमा दिल्ली की कड़कड़डूमा न्यायालय को स्थानांतरित कर दिया। और मुकदमे का सभी रिकॉर्ड दो सप्ताह के अंदर मुजफ्फरनगर से दिल्ली भेजने का आदेश दिया। लेकिन मुकदमे का सभी रिकॉर्ड कड़कड़डूमा न्यायालय तक नहीं पहुंचा। केवल पूरक आरोपपत्र कड़कड़डूमा न्यायालय पहुंचा। जब केस का रिकार्ड दिल्ली की न्यायालय में नहीं पहुंचा तो नवल किशोर ने सर्वोच्च न्यायालय में फिर अर्जी डाली। सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2011 में दिल्ली और मुजफ्फर नगर दोनों ही न्यायालयों से रिपोर्ट मांगी। दिल्ली की कड़कड़डूमा न्यायालय ने कहा कि रिकार्ड नहीं मिला है और मुजफ्फरनगर की न्यायालय ने कहा कि फाइल डाक से भेजी गई है। न्यायालय ने मामले पर राज्य के वकील से सुझाव मांगते हुए सुनवाई 21 नवंबर तक टाल दी, लेकिन इस बीच कड़कड़डूमा अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय को चिट्ठी भेजकर बताया कि रिकॉर्ड मिल गया है, जिस पर न्यायालय ने 21 नवंबर की सुनवाई में अपना फैसला सुना दिया। इस फैसले में सारे अभियुक्तों को बरी कर दिया गया।
नवल किशोर का कहना है कि जब अगले दिन 22 नवंबर 2011 को उसने कड़कड़डूमा न्यायालय में अर्जी देकर रिकार्ड देखा तो पाया कि केस का पूरा रिकार्ड नहीं पहुंचा था। उसके बाद से वह बाकी रिकार्ड की फाइलें स्थानांतरित कराने की गुहार लेकर न्यायालयों के चक्कर काट रहे हैं। इस बीच उन्होंने कई बार सर्वोच्च न्यायालय को चिट्ठी भेज कर अपनी बात बताने का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं पहुंच पायी, परन्तु इस बार उसकी हताशा भरी चिट्ठी पर सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लेकर नवल किशोर की चिट्ठी को जनहित याचिका में बदल दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी सूचना नवल किशोर के मोबाइल पर एसएमएस के जरिए भेज दी है। हालांकि न्यायालय ने अभी तक मामले की सुनवाई की तारीख निश्चित नहीं की है।
जयपुर (राजस्थान)। हमारे देश में आम राय है कि पुलिस कमजोर और गरीब व्यक्ति को न्याय दिलाने की बजाय अन्याय ही करती है। यदि गरीब को न्याय प्राप्त करने के लिए पुलिस की मदद चाहिए तो उसकी किसी नेता या अधिकारी से पहचान होनी चाहिए या फिर पुलिस को देने के लिए उसके पास धन होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो उसे न्याय की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। पुलिस का ऐसा ही कारनामा बीकानेर जिले की नोखा तहसील में देखने को मिला है, जहां के डीएसपी महमूद खान को शुक्रवार को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने हत्या के आरोपियों को गिरफ्तार करने के एवज में 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते पकड़ा है। मामले में महमूद खान से पूछताछ जारी है।
परिवादी पनाराम जाट का कहना है कि उसकी बहन को ससुराल वाले दहेज के लिए परेशान कर रहे थे। जिसके चलते उसके ताऊजी ने देशनोक थाना में मामला दर्ज कराया था। इस दौरान बहन की मृत्यु हो गई। जिसके बाद से मामले की जांच महमूद खान कर रहे थे। बहन की मृत्यु के आरोपियों के खिलाफ 304 बी के तहत पहले से मामला दर्ज था, पर महमूद खान उन्हें गिरफ्तार नहीं कर रहे थे। जिससे परेशान होकर परिवादी पनाराम जाट ने महमूद खान की शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में कर दी। एसीबी के एएसपी रजनीश पुनिया ने बताया कि पनाराम जाट ने अपनी शिकायत में बताया था कि दहेज के कारण उसकी बहन की हत्या से जुड़े मामले में नोखा के डीएसपी महमूद खान आरोपियों को गिरफ्तार करने के बदले रिश्वत की मांग कर रहे हैं। जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने इस शिकायत का सत्यापन किया तो यह बात सामने आयी कि महमूद खान पनाराम जाट से दो लाख रुपये रिश्वत मांग रहे हैं।
इसके बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की टीम ने डीएसपी महमूद खान को रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार करने की योजना बनायी। और फिर टीम की योजना के मुताबिक महमूम खान ने शिकायतकर्ता पनाराम को अपने सरकारी आवास पर बुला लिया। एसीबी की टीम ने पनाराम जाट को रिश्वत देने के लिए केमिकल लगा नोट देकर महमूद खान के पास भेजा दिया। पनाराम ने जैसे ही डीएसपी महमूद खान को 50 हजार रुपये दिए वैसे ही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की टीम ने उन्हें रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया। और रुपये भी जब्त कर लिए। अब आगे की कार्रवाई जारी है।
गुना (मध्य प्रदेश)। सरकार के तमाम दावों के बावजूद अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भ्रष्टाचार का गठजोड़ खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला गुना जिले के चांचौड़ा कस्बे में सामने आया है, जहां ग्वालियर की लोकायुक्त पुलिस की टीम ने गुरुवार को एक पटवारी को 25 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए पकड़ा। पटवारी पर आरोप है कि वह एक प्लॉट का नामांतरण कराने के बदले रिश्वत की मांग कर रहा था। वहीं पटवारी का कहना है कि वह तहसीलदार बजरंग बहादुर सिंह को देने के लिए यह राशि ले रहा था। पुलिस ने आरोपी पटवारी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।
गुना जिले के चांचौड़ा कस्बे के निवासी विनय भदौरिया ने ग्वालियर की लोकायुक्त पुलिस से 23 जुलाई को शिकायत की थी। पुलिस से शिकायत में इन्होंने बताया था कि चांचौड़ा में उन्होंने एक प्लॉट खरीदा था, उसके नामांतरण का प्रकरण चांचौड़ा तहसीलदार बजरंगबहादुर सिंह की न्यायालय में चल रहा है। 26 जुलाई को न्यायालय में इसकी सुनवाई होनी है। चांचौड़ा के हल्का नंबर 12 में पदस्थ पटवारी शिवप्रताप सिंह ने उसी प्लॉट का नामांतरण तहसीलदार से करवाने के लिए 25 हजार रुपए की मांग की थी। इस बातचीत को आवेदक विनय भदौरिया ने रिकॉर्ड कर लिया।
इस मामले की शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने पटवारी को रंगेहाथ पकड़ने के लिए जाल बिछाया और विनय भदौरिया को चांचौड़ा कस्बे में किराए के मकान में रहने वाले पटवारी शिवप्रताप सिंह को रिश्वत देने के लिए भेजा। तय योजना के अनुसार जैसे ही पटवारी शिव प्रताप सिंह विनय भदौरिया की कार में आकर बैठा और 25 हजार रुपए लेने लगा वैसे ही मौके पर मौजूद लोकायुक्त पुलिस की टीम ने उसको पकड़ लिया। लोकायुक्त टीआई कविंद्र सिंह चौहान का कहना है कि पटवारी ने तहसीलदार को देने के लिए रिश्वत ली थी। प्रकरण की जांच में साक्ष्य सामने आने पर तहसीलदार को भी आरोपित बनाया जाएगा। और नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
यदि आप वाहन चलाते समय किसी भी प्रकार से ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते हैं तो आपको तीन प्रकार से ट्रैफिक चालान भरने पड़ेंगे।
कोई ट्रैफिक पुलिसवाला आपका चालान तभी काट सकता है जब उसने वर्दी पहनी हुई हो और उस पर नेमप्लेट लगाई हुई हो। अगर उसने वर्दी नहीं पहनी है या नेम प्लेट नहीं लगाई हुई है तो आप उसकी कार्रवाई का विरोध कर सकते हैं। और उससे उसका आईकार्ड मांग सकते हैं।
ग्वालियर (मध्य प्रदेश)। केंद्र सरकार डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है। वहीं जीवाजी विश्वविद्याल के अधिकारी और कर्मचारी अपनी भ्रष्ट आदतों से बाज नहीं आ रहे हैं। उनकी इसी आदत से परेशान होकर जीवाजी विश्वविद्यालय की तीसरी मंजिल के छज्जे से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश की। छात्र चिल्लाकर कह रहा था कि विश्वविद्यालय ने मेरा जीवन बर्बाद कर दिया है। स्नातकोत्तर में उसे प्रवेश लेना है, लेकिन दो महीने से मार्कशीट (अंकपत्र) नहीं जा रही है। कोई अधिकारी उसकी नहीं सुन रहा है।
छात्र राहुल पाठक ग्वालियर में भितरवार क्षेत्र का रहने वाला है। उसने डबरा के वृंदासहाय कॉलेज से बीएससी किया है। पांचवें समेस्टर में उसकी एटीकेटी आई थी, जिसे उसने वर्ष 2018 में क्लियर कर लिया था। इसके बाद उसने मार्कशीट लेने के लिए दो महीने पहले टोकन भरकर जमा किया था। जिससे वह स्नातकोत्तर में प्रवेश ले सके। लेकिन विश्वविद्यालय कर्मचारी उसे 7 दिन बाद आने की बात कहकर टाल रहे थे। जब वह मंगलवार को वह फिर से मार्कशीट लेने आया। और प्रशासनिक भवन का चक्कर लगाता रहा, लेकिन कोई भी कर्मचारी या अधिकारी उसकी बात को सुनने को तैयार हुआ। इससे परेशान होकर वह प्रशासनिक भवन की तीसरी मंजिल के छज्जे पर कूद गया और चिल्लाने लगा कि जीवाजी विश्वविद्याल ने मेरा जीवन बर्बाद कर दिया। मार्कशीट के लिए मैं पेरशान हो चुका हूं, लेकिन यहां पर कोई सुनने वाला नहीं है। दो महीने से अधिकारी चक्कर लगवा रहे हैं। इस घटना की जानकारी मिलने के बाद अधिकारी व कर्मचारियों के हाथ पैर फूल गए। हालांकि मौके पर मौजूद दूसरे छात्रों ने छज्जे पर जाकर उसको पकड़ लिया। और उसे ऊपर खींचा लिया, जिससे उसकी जान बच गयी । गौलतलब है कि छात्र 11 जुलाई से मार्कशीट के लिए चक्कर लगा रहा था।
वहीं जीवाजी विश्वविद्याल के कुल सचिव डॉ आई के मंसूरी का कहना था कि छात्र की मार्कशीट शाम तक जारी कर दी जाएगी। लेकिन इसके बावजूद शाम तक छात्र को मार्कशीट नहीं दी गयी। और शाम तक उससे कहा गया कि अब बुधवार को उसे मार्कशीट मिलेगी।
नई दिल्ली। लोकसभा में सूचना का अधिकार कानून में संशोधन संबंधी बिल पास होने के बाद विपक्ष ने राज्यसभा में इसका तगड़ा विरोध करने का फैसला किया है। विपक्षी पार्टियों के साथ ही बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने भी आरटीआइ संशोधन बिल को सेलेक्ट कमिटी में भेजने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। विपक्ष का आरोप है कि इस संशोधन बिल को आरटीआइ कानून को कमजोर कर सूचना हासिल करने को ज्यादा मुश्किल बनाने के लिए लाया गया है।
सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 सोमवार को विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद लोकसभा में पास हो गया। इस विधेयक में प्रावधान किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों तथा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें केंद्र सरकार द्वारा तय की जाएंगी। कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य राजीव गौड़ा ने कहा कि यदि सरकार को आरटीआई आयुक्तों का कार्यकाल तय करने की आजादी मिल जाएगी, तो उनकी शक्ति कमजोर हो जाएगी। जबकि कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी ने कहा है कि इस संशोधन बिल के जरिये सरकार ऐतिहासिक आरटीआइ कानून को ध्वस्त करने पर आमादा है। उन्होंने सरकार के कदम को नागरिकों से उनका हक छीनने जैसा करार दिया है। वहीं विपक्ष ने इस संशोधन को इस बिल की मूल भावना को मारने और पारदर्शिता की स्वतंत्रता पर हमला बताया है। इसीलिए विपक्ष ने आरटीआइ संशोधन बिल को राज्यसभा की सेलेक्ट कमिटी को भेजने की संयुक्त रणनीति बनाई है। कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, राजद, एनसीपी समेत 16 पार्टियों के सांसदों ने आरटीआइ संशोधन बिल को सेलेक्ट कमिटी में भेजने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। आरटीआई संशोधन बिल लोकसभा से पारित होने के बाद सरकार बुधवार को राज्यसभा में पेश करने की तैयारी में है।
वहीं देश के पहले मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने भी आरटीआई कानून में संशोधन के लिए केंद्र सरकार के कदम को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा, 'अगर आपके पास जानकारी लाने वाले लोग सच बताने से डरेंगे, तो जानकारी आप तक कैसे पहुंचेगी?' 'क्या हमारे पास प्रधानमंत्री के पास जाने और अपनी समस्याओं को रखने का अधिकार है? नहीं, ऐसा करने का एकमात्र नैतिक तरीका आरटीआई के माध्यम से है।
जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने सरकार का पक्ष रखते हुए मीडिया को बताया कि सेक्शन 27 में संशोधन करने के बाद ही सरकार को नियम बनाने का अधिकार मिलता है। सेक्शन 13 और 16 में संसोधन किया जा रहा है ताकि सूचना आयुक्त का कार्यकाल और उनके कार्यालय की नियम व शर्तें तय की जा सकें। यह बिल आरटीआई ऐक्ट को और युक्तिसंगत बनाने के लिए है। उन्होंने कहा, 'इस बिल की स्वायत्ता के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया गया है। इस प्रकार के जो भी धारणा बनाई जा रही है वह गलत प्रायोजित है। यह बिल विधायिका को और ताकत देने वाला है।'