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गौतमबुद्ध नगर जिले में जांच में खुलासा हुआ है कि थानों में 2 होमगार्डों की ड्यूटी लगाकर 10 होम गार्डों का वेतन निकाल लिया जाता था। इसके बाद विभिन्न थानाध्यक्षों के फर्जी हस्ताक्षर व मुहर के सहारे बैंक से दैनिक भत्ता निकाल लिया जाता था।
भारतीय संविधान में या फिर संसद के द्वारा पारित किसी भी अन्य विधि में लाभ के पद को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन फिर भी लाभ के पद के बारे में संविधान में उल्लेख अवश्य किया गया है।
भारतीय संविधान में या फिर संसद के द्वारा पारित किसी भी अन्य विधि में लाभ के पद को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन फिर भी लाभ के पद के बारे में संविधान में उल्लेख अवश्य किया गया है।
नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ हो रही कार्रवाई से जनता में एक बार फिर उम्मीद जगी है। और ऐसा लग रहा है कि शायद भ्रष्ट व्यवस्था में कुछ न कुछ सुधार अवश्य होगा।
नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ हो रही कार्रवाई से जनता में एक बार फिर उम्मीद जगी है। और ऐसा लग रहा है कि शायद भ्रष्ट व्यवस्था में कुछ न कुछ सुधार अवश्य होगा।
क्या मंत्रियों और नेताओं की गाड़ी से लाल बत्ती व हूटर हटवाने से वीआईपी कल्चर खत्म हो गया है? उत्तर है नहीं,,,, बत्ती चली गयी, लेकिन बल नहीं गया। हमारे देश में नेता चुनाव जीतते ही जनता के सेवक से वीआईआईपी हो जाते हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और पार्षद आदि का पद ग्रहण करते ही पुलिस और कमांडो की सुरक्षा में गाड़ियों के कारवां के बीच चलने लगते हैं।
क्या मंत्रियों और नेताओं की गाड़ी से लाल बत्ती व हूटर हटवाने से वीआईपी कल्चर खत्म हो गया है? उत्तर है नहीं,,,, बत्ती चली गयी, लेकिन बल नहीं गया। हमारे देश में नेता चुनाव जीतते ही जनता के सेवक से वीआईआईपी हो जाते हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक और पार्षद आदि का पद ग्रहण करते ही पुलिस और कमांडो की सुरक्षा में गाड़ियों के कारवां के बीच चलने लगते हैं।
देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर हाहाकार तो मचा ही है, अब प्रदूषित पीने के पानी ने दिल्ली के लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है। वहीं इस गंभीर मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार आमने-सामने आ गए हैं। हाल ही में उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि दिल्ली में पानी की गुणवत्ता बीआईएस (भारतीय मानक ब्यूरो) के अनुरूप नहीं है। दिल्ली के 11 क्षेत्रों से प्राप्त नमूनों की जांच से पता चला है कि पानी पीने के लायक नहीं हैं।
दिल्ली में हर वर्ष सर्दी शुरु होते ही वायु प्रदूषण को लेकर हाहाकार मचा जाता है। इस बार भी हेल्थ इमरजेंसी जैसे हालात हो गए हैं। वहीं इस समस्या का ठोस निदान करने की बजाय केंद्र और दिल्ली सरकार चुनावी मोड में हैं। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरु कर दिया है। और वायु प्रदूषण का सारा ठीकरा पराली जलाने वाले पंजाब और हरियाणा के किसानों के सिर पर फोड़ दिया है।
दिल्ली में हर वर्ष सर्दी शुरु होते ही वायु प्रदूषण को लेकर हाहाकार मचा जाता है। इस बार भी हेल्थ इमरजेंसी जैसे हालात हो गए हैं। वहीं इस समस्या का ठोस निदान करने की बजाय केंद्र और दिल्ली सरकार चुनावी मोड में हैं। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरु कर दिया है। और वायु प्रदूषण का सारा ठीकरा पराली जलाने वाले पंजाब और हरियाणा के किसानों के सिर पर फोड़ दिया है।
हम इसी मुद्दे पर बात करेंगे कि कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) क्या है,,,, निधि को किस प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है। और किस प्रकार से कंपनी की मनमानी के खिलाफ शिकायत की जा सकती है।
पुलिस बल राज्य द्वारा अधिकार प्राप्त व्यक्तियों का एक निकाय है, जो राज्य के द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने, संपत्ति की रक्षा और नागरिक अव्यवस्था को सीमित रखने का कार्य करता है। पुलिस को प्रदान की गई शक्तियों में बल का वैध उपयोग करना भी शामिल है।
पुलिस बल राज्य द्वारा अधिकार प्राप्त व्यक्तियों का एक निकाय है, जो राज्य के द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने, संपत्ति की रक्षा और नागरिक अव्यवस्था को सीमित रखने का कार्य करता है। पुलिस को प्रदान की गई शक्तियों में बल का वैध उपयोग करना भी शामिल है।
अधिवक्ता वह होता है जिसको कोर्ट में किसी अन्य व्यक्ति की तरफ से प्रतिपादन करने या दलीलों को रखने का अधिकार प्राप्त हो।
उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा शुरु की गयी ऑनलाइन एफआईआर की सुविधा क्या है और इसका उपयोग करने में क्या-क्या समस्याएं आ रही हैं।
हमारे देश में विधायक चुनने की परपंरा इसलिए शुरू की गई थी कि जनता द्वारा निर्वाचित विधायक अपने-अपने क्षेत्र के विकास एवं समस्याओं को विशेष प्राथमिकता देंगे और वहां की जनता की सेवा करेंगे, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ ही है। आजकल विधायक बनना तो स्टेटस सिंबल बन गया है। विधायकों में अब जनसेवा की भावना तो दिखाई ही नहीं देती है। विधानसभा सदस्य बनने के बाद विधायक जनता की बजाय अपने परिवार की सेवा में जुट जाते हैं और रातों-रात खाकपति से करोड़पति बन जाते हैं। और कारों के काफिले और कमांडो की सुरक्षा में घूमने लगते हैं। वहीं उनको चुनने वाली जनता या कहें उनका मालिक उन्हें देखकर हैरान परेशान ताकता रह जाता है कि आखिर यह कैसा लोकतंत्र है। जिसमें रातों-रात नौकर मालिक हो जाता है और मालिक नौकर हो जाता है।
हमारे देश में विधायक चुनने की परपंरा इसलिए शुरू की गई थी कि जनता द्वारा निर्वाचित विधायक अपने-अपने क्षेत्र के विकास एवं समस्याओं को विशेष प्राथमिकता देंगे और वहां की जनता की सेवा करेंगे, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ ही है। आजकल विधायक बनना तो स्टेटस सिंबल बन गया है। विधायकों में अब जनसेवा की भावना तो दिखाई ही नहीं देती है। विधानसभा सदस्य बनने के बाद विधायक जनता की बजाय अपने परिवार की सेवा में जुट जाते हैं और रातों-रात खाकपति से करोड़पति बन जाते हैं। और कारों के काफिले और कमांडो की सुरक्षा में घूमने लगते हैं। वहीं उनको चुनने वाली जनता या कहें उनका मालिक उन्हें देखकर हैरान परेशान ताकता रह जाता है कि आखिर यह कैसा लोकतंत्र है। जिसमें रातों-रात नौकर मालिक हो जाता है और मालिक नौकर हो जाता है।
हमारे देश की जनता 'लोकसभा चुनाव' के जरिए अपना सांसद चुनती है। इन सांसदों की सहमति से ही देश के लिए नए कानून बनाए जाते हैं और पुराने कानूनों में न्यायोचित संशोधन किया जाता है। इसके साथ ही ये सांसद देश के विकास के लिए योजनाएं एवं देश के नागरिकों की तरक्की व रोजगार के लिए प्रबंधन भी करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि संसद में देश का भविष्य तय किया जाता है। यानी सांसद देश का भाग्य विधाता होता है। लेकिन सच में क्या ऐसा है ? शायद नहीं ! लाखों रुपए वेतन-भत्ते और पांच करोड़ रुपए सांसद निधि पाने वाले हमारे भाग्य विधाता सांसद देश के नागरिकों का भाग्य बदलने की बजाय अपना और अपने परिवार का भाग्य बदलने में जुटे हुए हैं। वह रातों-रात खाकपति से करोड़पति बन रहे हैं। वहीं उनको चुनने वाली जनता उन्हें देखकर हैरान और परेशान है कि आखिर इनकी मनमानी कब रुकेगी?
हमारे देश की जनता 'लोकसभा चुनाव' के जरिए अपना सांसद चुनती है। इन सांसदों की सहमति से ही देश के लिए नए कानून बनाए जाते हैं और पुराने कानूनों में न्यायोचित संशोधन किया जाता है। इसके साथ ही ये सांसद देश के विकास के लिए योजनाएं एवं देश के नागरिकों की तरक्की व रोजगार के लिए प्रबंधन भी करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि संसद में देश का भविष्य तय किया जाता है। यानी सांसद देश का भाग्य विधाता होता है। लेकिन सच में क्या ऐसा है ? शायद नहीं ! लाखों रुपए वेतन-भत्ते और पांच करोड़ रुपए सांसद निधि पाने वाले हमारे भाग्य विधाता सांसद देश के नागरिकों का भाग्य बदलने की बजाय अपना और अपने परिवार का भाग्य बदलने में जुटे हुए हैं। वह रातों-रात खाकपति से करोड़पति बन रहे हैं। वहीं उनको चुनने वाली जनता उन्हें देखकर हैरान और परेशान है कि आखिर इनकी मनमानी कब रुकेगी?