आपका अधिकार

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उत्तराधिकार का अधिकार



  • जब तक माता पिता जीवित हैंउन की संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं है। पुत्र को वयस्क अर्थात 18 वर्ष का होने तक तथा पुत्री का उसके विवाहित होने तक मात्र भरण पोषण का अधिकार है।
  • पत्नी के नाम से खरीदी गई संपत्ति जिस के क्रय मूल्य का भुगतान पति ने किया है, उसके लिए यह माना जाएगा कि वह पत्नी के हितों के लिए खरीदी गई है, लेकिन यदि पति यह साबित कर देता है कि वह उस की पत्नी के हितों के लिए नहीं खरीदी गई थी तो वह संपत्ति पति की ही मानी जाएगी।
  • किसी फंड या बीमा पॉलिसी में नामांकन हो जाने से नामांकित व्यक्ति के नाम संपत्ति हस्तांतरित नहीं हो जाती है । वह तो किसी की मृत्यु के बाद इन रकमों का केवल ट्रस्टी है ।

सौतेले बच्चे को उत्तराधिकार- 

  • अगर सौतेला पिता बच्चे को गोद ले लेता है तो बच्चा सौतेले पिता का उत्तराधिकारी हो जाता है। और यदि उनकी कोई पुश्तैनी संपत्ति हुई तो उसमें वह हिस्सेदार होगा। गोद लेने के लिए गोदनामे का पंजीकरण कराना पड़ेगा अन्यथा वह अनेक मामलों में मान्य नहीं होगा। 

पुश्तैनी संपत्ति पर उत्तराधिकार-

  • यदि पिता के पास कोई पुश्तैनी संपत्ति है, (ऐसी संपत्ति जो आप के पिता या दादा या परदादा को 17 जून 1956 के पूर्व उन के पिता या पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तथा उस संपत्ति की आय से खरीदी गई संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति हैं) तो उस में पिता की सभी संतानों का हिस्सा होता है और उसे न तो वह किसी को दे सकता है और न ही विक्रय कर सकता है। वह केवल उस संपत्ति में अपना हिस्सा हस्तान्तरित कर सकते हैं।

माता-पिता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार-

  • स्वअर्जित सम्पत्ति उस सम्पत्ति को कहा जाता है जो कोई व्यक्ति किसी सेवा, व्यापार आदि से स्वयं कमाता है और उस सेवा या व्यापार में संयुक्त हिन्दू परिवार या सहदायिक सम्पत्ति का कोई योगदान नहीं होता है और ऐसी स्वअर्जित सम्पत्ति का कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी इच्छानुसार व्यय कर सकता है।
  • माता-पिता की संपत्ति यदि उन की स्वअर्जित है तो उस पर उनका पूर्ण अधिकार है। वे पुत्र को उस संपत्ति से निकलने को कह सकते हैं, लेकिन पुत्र न निकले तो जबरन निकाला नहीं  जा सकता है। उसके लिए उन्हें पुत्र के वहाँ रहने की अनुज्ञा (लायसेंस) समाप्त करनी होगी। फिर भी पुत्र घर नहीं छोड़ता है, उसके विरुद्ध संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने के लिए पिता दीवानी वाद कर सकता है। 

हिंदू द्वारा दूसरी शादी करने पर उत्तराधिकार- 

  • उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि किसी हिंदू पुरुष द्वारा पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी कर लेने से दूसरी पत्नी को उत्तराधिकार नहीं मिलता है , लेकिन उसके बच्चों का पहली पत्नी के बच्चों की तरह ही अधिकार होता है ।

हिन्दू महिला को मकान विभाजन का अधिकार-

  • हिन्दू उत्तराधिकार कानून के अनुसार महिला संयुक्त परिवार के रिहायशी मकान का विभाजन मांग सकती है।
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