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मेधा पाटकर



 प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का जन्म 1 दिसंबर 1954 को मुंबई में हुआ। मुंबई (महाराष्‍ट्र) में जन्‍मी मेधा के पिता श्री वसंत खानोलकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जबकि मां सामाजिक कार्यकर्ता इंदु खानोलकर जो महिलाओं के शैक्षिक, आर्थिक और स्वास्थ्य के विकास के लिए काम करती थीं। 

   मेधा ने टाटा इंस्‍टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से सोशल वर्क में एमए की डिग्री प्राप्‍त की और मुंबई में बसी झुग्गियों में बसे लोगों की सेवा करने वाली संस्‍थाओं से जुड़ गईं। पांच साल तक मुंबई और गुजरात की कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ जुड़कर काम करना शुरू किया। साथ ही टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस में स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को पढ़ाने लगी। तीन साल 1977-1979 तक उन्होंने इस संस्थान में अध्यापन का काम किया। इस बीच वे परिणय-सूत्र में बंधी, लेकिन यह रिश्ता ज़्यादा दिन तक नहीं टिक पाया और दोनों आपसी सहमति से अलग हो गए। मेधा ने सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र में गहन शोध किया है। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित मेधा पाटकर ने सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित होने वाले लगभग 37 हज़ार गांवों के लोगों को अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ी है। सरदार सरोवर परियोजना के अवलोकन के लिए 1985 में मेधा पाटकर ने अपने कुछ सहकर्मियों के साथ नर्मदा घाटी क्षेत्र का दौरा किया। उन्होंने मध्य प्रदेश से सरदार सरोवर बांध तक अपने साथियों के साथ मिलकर 36 दिनों की यात्रा की। मेधा पाटकर ने परियोजना रोकने के लिए संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने धरना-प्रदर्शन करना शुरू किया। सात सालों तक लगातार विरोध के बाद विश्व बैंक ने हार मान ली और परियोजना को आर्थिक सहायता देने से मना कर दिया। बाद में वे महेश्वर बांध के विस्थापितों के आंदोलन का नेतृत्व भी करने लगीं। 1985 से वह नर्मदा से जुड़े हर आंदोलन में सक्रिय रही हैं। 1991 में उन्होंने 22 दिनों का अनशन किया, तब उनकी हालत बहुत बिगड़ गई थी। 1993 और 1994 में भी उन्होंने लंबे उपवास किए। 28 मार्च 2006 को उन्‍होंने नर्मदा नदी के बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने के विरोधस्‍वरूप भूख हड़ताल पर बैठने का निर्णय लिया, 17 अप्रैल 2006 को सुप्रीम कोर्ट से नर्मदा बचाओ आंदोलन के तहत बांध पर निर्माण कार्य रोक देने की अपील को खारिज कर दिया। मध्य प्रदेश और गुजरात सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र के जरिए नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया कि वे प्रभावित परिवारों के लिए चल रहे राहत व पुर्नवास कार्यों में विदेशियों की मदद से बाधा पहुंचा रहे हैं। दोनों राज्य सरकारों ने उनपर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाते हुए सीबीआई से जांच की मांग की। 5 1995 को उत्तराखंड के प्रमुख सर्वोदयी नेता श्री सुंदरलाल बहुगुणा के आमरण अनशन के 51 दिन पूर्ण होने पर उनसे मिलने टिहरी जा रही मेधा पाटकर को टिहरी पहुंचने से पहले ही नरेंद्र नगर नामक स्थान पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। भारत के सभी जनांदोलनों को एक-दूसरे से जोड़ने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। उन्होंने एक नेटवर्क की शुरुआत की जिसका नाम है - नेशनल एलांयस फॉर पीपुल्स मूवमेंट।

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