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जानें, क्या है? 1977 का राष्ट्रीय पुलिस आयोग

Jul 17, 2015

जनता पार्टी की सरकार ने 14 मई 1977 में सभी राज्यों में पुलिस सुधार के लिए पूर्व आइसीएस धर्मवीर की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया था। जिसका काम भारत में पुलिस व्यवस्था की कार्यशैली और नागरिकों के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी तय करने संबंधी सलाह देना था। फरवरी 1979 और मई 1981 के बीच इसने कुल आठ रिपोर्टें दीं। प्रथम दो रिपोर्टों के बाद ही 1980 में जनता पार्टी की सरकार गिर गयी। इन रिपोर्टों पुलिस सुधार, प्रशिक्षण तथा पुलिस-जनता के संबंधों के मामले में कई स़िफारिशें की गयी। हालांकि जब कांग्रेस 1980 में वापस सत्ता में आई तो उसने राष्ट्रीय पुलिस आयोग को भंग कर दिया और उसकी सभी रिपोर्टों पर कड़ा ऐतराज़ भी जताया।

राष्ट्रीय पुलिस आयोग की महत्वपूर्ण स़िफारिशें-

  1. किसी राज्य के पुलिस प्रमुख का कार्यकाल एक निश्चित समय के लिए सुनिश्चित हो, कार्यात्मक स्वतंत्रता को प्रोत्साहन दिया जाय।
  2. पुलिस के कामकाज में किसी तरह का बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए।
  3. हर राज्य में एक सुरक्षा आयोग की स्थापना की जाए।
  4. 1861 के पुलिस अधिनियम को नए क़ानून से बदला जाए। 

1996 में यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने पुलिस सुधार के लिए एनपीसी की सिफारिशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। प्रकाश सिंह की याचिका पर 2006 में फैसला आया और न्यायालय ने पुलिस सुधार के लिए गाइडलाइंस देते हुए उन्हें सभी राज्यों में लागू किए जाने के आदेश दिए।

सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख गाइडलाइंस-

  1. स्टेट सिक्योरिटी कमीशन की स्थापना की जाए, ताकि पुलिस बिना किसी बाहरी दबाव के कार्य करे।
  2. पुलिस स्टैब्लिशमेंट बोर्ड का गठन किया जाए, जिससे कार्मिक मामलों में पुलिस को स्वायत्तता हो।
  3. पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी बनाई जाए जो पुलिस के विरुद्ध गंभीर शिकायतों की जांच कर सके।
  4. पुलिस प्रमुख से लेकर थाना प्रभारी तक का सही चयन और न्यूनतम 2 वर्ष का कार्यकाल निश्चित किया जाए।
  5. अपराध की विवेचना और शांति व्यवस्था के लिए अलग-अलग पुलिस बल की व्यवस्था की जाए।
  6. एक नये पुलिस अधिनियम को लागू किया जाना चाहिए। 

बड़े दु:ख की बात है आज तक किसी भी राज्य सरकार ने इन संस्तुतियों को महत्व देना मुनासिब नहीं समझा। कुछ कम महत्व की संस्तुतियों को स्वीकार करके शेष पूरी रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया। दरअसल हमारे देश के नेता अंग्रेजी पुलिस कानून(भारतीय पुलिस अधिनियम 1861) के जरिए पुलिस तंत्र पर नियंत्रण बनाकर रखना चाहते हैं, जिससे वह मनमानी तरीके से बेखौफ होकर पुलिस का उपयोग या दुरुपयोग  कर सकें। और कानून के नाम पर बेबस जनता उनकी प्रताड़ना सहती रहे। 

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