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पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें

पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें

एफआईआर न दर्ज करने पर शिकायत 

देशभर में लोगों की ये शिकायतें आम हैं कि पुलिस उनकी शिकायत नहीं लेती है, या फिर एफआईआर दर्ज नहीं करती है। यदि  उसने शिकायत ले भी ली और एफआईआर दर्ज भी कर ली तो समुचित कारर्वाई नहीं करती है।

पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें 

इस समस्या को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि यदि पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से इंकार करे तो आप सम्बंधित शिकायत के साथ सिटी मजिस्ट्रेट से संपर्क करें। 

FIR पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि आम लोगों को चाहिए कि यदि उनकी एफआईआर दर्ज नहीं हो रही है तो सीआरपीसी कि धारा 154(3) के तहत उन्हें पहले पुलिस अधीक्षक या सेक्शन 36 में वर्णित अन्य पुलिस अधिकारी के पास जाना चाहिए।

यदि फिर भी एफ आई आर दर्ज न हो तो सीआरपीसी कि धारा 156(3) के तहत सिटी मजिस्ट्रेट के पास जाए, न कि धारा 482 के तहत सम्बंधित हाई कोर्ट के पास जाएं। हाईकोर्ट मामले को सुनने से मना कर सकती है।

आम लोग यदि चाहें तो धारा 200 के तहत मजिस्ट्रेट के पास आपराधिक शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं। 

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 14/07/2008 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाईट पर भी अपलोड किया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा आम लोग उपरोक्त निर्देश को पढ़ें और अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में अपने अधिकारों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करें। 

सिटी मजिस्ट्रेट पूर्णतः सतर्क रहे एवं पुलिस अधिकारी द्वारा किसी भी तरह की अनुपालना में कमी की शिकायत को गम्भीरता से लेते हुए न सिर्फ उस अधिकारी के विरुद्ध कारर्वाई करें बल्कि सजा के तौर पर जेल भी भेज सकते हैं। 

अदालत ने 14/07/2008 के आदेश में व्यवस्था दी थी कि देश के सभी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिव एवं सभी पुलिस महानिदेशक यह सुनिश्चित करेंगे कि देश के सभी पुलिस स्टेशन में लोगों की शिकायत आते ही उनकी एफआईआर दर्ज की जाये,

यदि एफआईआर दर्ज नहीं कि गई तो इसकी शिकायत सम्बंधित सिटी मजिस्ट्रेट को करें, जो कि न सिर्फ एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करेंगे बल्कि आदेश जारी होने के 24 घंटे के अंदर एफआईआर दर्ज होना भी सुनिश्चित करेंगे,

यदि ऐसा नहीं हुआ तो मजिस्ट्रेट सम्बंधित पुलिस अधिकारी को अवमानना के तहत सजा देंगे जो कि सर्विस रूल के तहत बर्खास्तगी के अलावा जेल यात्रा तक कुछ भी हो सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 12/11/2013 को अपने फ़ाइनल आदेश में कहा कि- किसी भी पुलिस स्टेशन की डायरी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, जिसमें आम लोगों की सभी शिकायतें दर्ज कि जानी चाहिए।

शिकायत दर्ज होने के बाद उस पर प्राथमिक जांच हो कि उसमें कौन सा अपराध बनता है। अगर संज्ञेय अपराध परिलक्षित होता है तो धारा 154 के तहत एफआईआर दर्ज कर उसकी एक कॉपी शिकायतकर्ता को मुहैया कराई जाए।

अगर संज्ञेय अपराध नहीं है तो प्राथमिक जांच करके शिकायतकर्ता को एफआईआर दर्ज नहीं होने के कारणों सहित सूचित करते हुए शिकायत बंद कर दी जा सकती है।

संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलने पर एफआईआर दर्ज नहीं करने पर सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ कारर्वाई सुनिश्चित कि जाए।

इसलिए यदि पुलिस अधिकारी आपकी शिकायत लेने या एफआईआर दर्ज करने से मना करे तो आप निडर होकर उसके खिलाफ सिटी मजिस्ट्रेट से शिकायत करें और पुलिस थाने में अपनी एफआईआर दर्ज कराएं।

एफआईआर दर्ज ना होने पर चीफ मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट या चीफ च्यूडिशियल मजिस्ट्रेट से शिकायत(परिवाद) :- 

  • जब पुलिस अधिकारी एफआईआर के आधार पर कार्यवाही नहीं करता है, तब व्यथित व्यक्ति उस मजिस्ट्रेट को शिकायत कर सकता है , जिसे उस अपराध पर संज्ञान लेने की अधिकारिता है ।
  • अगर एफआईआर दर्ज न हो तो पीड़ित पक्ष इलाके के अडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट या चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा -156 (3) के तहत शिकायत कर सकता है। हर जिला अदालत में एक अडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मैजिस्ट्रेट बैठता है।
  • दिल्ली से बाहर के मामले में चीफ जूडिशियल मैजिस्ट्रेट ( सीजेएम ) के सामने शिकायत की जा सकती है। इसके बाद अदालत मामले को संबंधित मैजिस्ट्रेट को रेफर करती है। इसके बाद मैजिस्ट्रेट के सामने शिकायती अपना पक्ष रखता है और उससे संतुष्ट होने के बाद मैजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज करने का आदेश देता है। अगर मैजिस्ट्रेट ने अर्जी खारिज कर दी तो उस अदालती फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अर्जी दाखिल की जा सकती है।

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