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भारत में न्यायालयों की व्यवस्था

भारत में न्यायालयों की व्यवस्था

भारत में न्यायालय की व्यवस्था

  • सर्वोच्च न्यायालय- नई दिल्ली
  • उच्च न्यायालय-रज्यों में
  • जिले स्तर पर न्यायालय-
  •   कार्यपालिका के न्यायिक अधिकारी
  1.         जिला मजिस्ट्रेट(डीएम)
  2.         अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट
  3.         सब डिविजनल मजिस्ट्रेट
  •  जिला न्यायालय- सिविल या दीवानी मामलों का न्यायालय।
  • सत्र न्यायालय-फौजदारी या आपराधिक मामलों का न्यायालय(नॉन-मेट्रोपोलिनटन एरिया)

              सत्र न्यायालय के न्यायाधीश-

  1.     सत्र न्यायाधीश,
  2.     अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,
  3.     मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट,
  4.     अतिरिक्त मुख्य मजिस्ट्रेट,
  5.     प्रथम श्रेणी न्यायिक  मजिस्ट्रेट
  6.     द्वितीय श्रेणी न्यायिक  मजिस्ट्रेट
  •   सत्र न्यायालय-फौजदारी या आपराधिक मामलों का न्यायालय(मेट्रोपोलिटन एरिया)

               सत्र न्यायालय के न्यायाधीश-

  1.    सत्र न्यायाधीश,
  2.    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,
  3.    मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ,
  4.    अतिरिक्त मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट,
  5.    मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट

 

न्यायाधिकरण(ट्रिब्यूनल)

  • सरकारी नौकरी तथा कराधान से जुड़े विवादों के लिए न्यायाधिकरण।

लोक अदालत

  • सुलह औऱ सफाई से विविदों को निपटाने का एक सस्ता माध्यम।
  • ऐसे फौजदारी मामलों को छोंड़कर  जिनमें समझौता गैरकानूनी है , अन्य सभी तरह के मामले लोक अदालतों द्वारा निपटाए जाते हैं ।
  • लोक अदालतों के फैसले दीवानी अदालतों के फैसलों की तरह सभी पक्षों को मान्य होते हैं ।
  • लोक अदालतों के फैसलों के खिलाफ किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकती है ।

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आज जिस तरह मीडिया कारपोरेट ढर्रे पर चल रही है, इसी ने हमें यह संकल्प लेने पर मजबूर किया कि हमें चुपचाप मौजूदा मीडिया के रास्ते पर नहीं चलना है, बल्कि देश के उन करोड़ों लोगों के अधिकारों की आवाज बनना है, जो इस लोकतांत्रिक देश में हर रोज अपने अधिकारों को पाने के लिए पुलिस, अधिकारी और नेता की मनमानी का शिकार बन रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। हालांकि जब हमने इसे शुरु किया तो हमारे सामने आर्थिक चुनौती खड़ी हो गयी, लेकिन हमने चुनौती को स्वीकार करते हुए थोड़े कम पैसों में ही एक कठिन रास्ते पर चलने की ठान ली और एक गैर-लाभकारी कंपनी बनाई। इंटरनेट का सहारा लिया और बिल्कुल अगल ही तरह का न्यूज पोर्टल बनाया। इसमें हमने अधिकारों की जानकारी देने के साथ ही अधिकारों से संबधित घटनाओं को लोगों तक पहुंचाने की शुरुआत की।

हमारा ऐसा मानना है कि यदि लोकसेवा अधिकारों को बचाए रखना है तो ऐसी पत्रकारिता को आर्थिक स्वतंत्रता देनी ही होगी। इसके लिए कारपोरेट घरानों और नेताओं की बजाय आम जनता को इसमें भागीदार बनना होगा। जो लोग भ्रष्टाचार मुक्त सच्ची पत्रकारिता को बचाए रखना चाहते हैं, वे सामने आएं और अधिकार एक्सप्रेस को चलाने में मदद करें। एक संस्थान के रूप में ‘अधिकार एक्सप्रेस’ लोकहित और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार चलने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा आपसे निवेदन है कि आप हमें पढ़ें और इस जानकारी को जन-जन तक पहुंचाएं, शेयर करें, और बेहतर करने का सुझाव दें।